पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध की आग में आगरा का जेनरेटर उद्योग भी झुलसने लगा है। माल फंसने के डर से निर्यातक खाड़ी देशों से मिलने वाले जेनरेटर के ऑर्डर रद्द कर रहे हैं। वहीं प्लास्टिक का दाना महंगा होने से जेनरेटर के प्लास्टिक-रबर के पार्ट भी महंगे हो गए हैं। कारोबारियों का कहना है कि युद्ध लंबा खिंचा तो कई छोटी इकाइयां बंद होने के कगार पर पहुंच जाएंगी। नेशनल चैंबर ऑफ इंडस्ट्रीज एंड कॉमर्स के अध्यक्ष संजय गोयल ने बताया कि जिले में 150 से अधिक डीजल पंप सेट की निर्माता इकाई हैं। यहां से इंजन पंप का 80 फीसदी निर्यात मिश्र, ईरान, ईराक, ओमान, कतर, सउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात समेत अन्य खाड़ी देशों में होता है। युद्ध के कारण रास्ते में माल फंसने के डर के कारण निर्यातक निर्यात नहीं कर रहे हैं। इसके कारण ऑर्डर भी रद्द कर दिए गए हैं। निर्यात नहीं होने से उत्पादन भी बेहद कम हो गया है। जेनरेटर कारोबारी पंकज अग्रवाल ने बताया कि जेनरेटर उद्योग में प्लास्टिक का पहिया, रेडिएटर, रबर के हाउस पाइप समेत अन्य का उपयोग होता है। युद्ध के कारण प्लास्टिक के दाने की कीमत में 20 फीसदी का उछाल आया है। प्लास्टिक के दाने की कीमत 80 से बढ़कर 100 रुपये प्रति पहिया हो गया है। ऐसे ही रबर की कीमत भी 20 फीसदी बढ़ने से 100 रुपये की आ रही है। इंजन कारोबारी उत्कर्ष बंसल ने बताया कि पंप सेट में प्लास्टिक-रबर के कई पार्ट बनते हैं। इनकी कीमतों में 30 फीसदी तक बढ़ोतरी हो गई है। इंजन ट्रॉली में लगने वाले रबर का पहिया गैस से पकाया जाता है। जरूरत के मुताबिक व्यावसायिक गैस सिलिंडर नहीं मिल पा रहे हैं। इसका भी उत्पादन पर असर पड़ रहा है। जल्द ही हल नहीं निकला तो जेनरेटर की कई छोटी इकाइयां ठप हो जाएंगी।