दिल्ली की नयनिका घोष ने बनारस, लखनऊ और जयपुर तीनों घरानों के कथक नृत्य से श्रोताओं को संशय में डाल दिया। थाल की दोनों शिराओं पर पैर रखकर करीब पांच मिनट तक उन्होंने नृत्य किया तो ऐसा लगा ही नहीं कि वह एडवांस स्टेज के कैंसर से पीड़ित थीं। 30 कीमोथेरेपी ले चुकीं कथक नृत्यांगना की ऊर्जा देख दर्शक अवाक रह गए।तबले की थिरकिट पर थाल के साथ वह दो फीट आगे-पीछे खिसककर नृत्य करती रहीं। 10 मिनट तक तबले और नृत्यांगना के घुंघरुओं के बीच सवाल-जवाब का भी दौर चला। कथक कलाकार ने ता थइया और तबला वादक ने ना-धिन-धिन-ना की भाषा में एक-दूसरे के सवालों के जवाब दिए तो श्रोता उसे डिकोड करने में लग गए। नयनिका घोष ने कथक से मां गंगा के विहंगम स्वरूप को बताते हुए भगवान राम की वंदना की। मानस और सुंदरकांड में सीता-हनुमान के प्रसंग को नृत्य में करके दिखाया। गुरु पं. विजयशंकर और पद्मविभूषण पं. बिरजू महाराज के सानिध्य में नृत्य की शिक्षा ले चुकीं नयनिका घोष ने तीन ताल में उठान, आमद, परन, रेला, चक्करदार परन, फरमाइशी परन, घुंघरुओं का चलन किया। पं. बिंदादीन महाराज की ठुमरी मुझे छेड़ो न नंद के सुनहु छैल... पर बड़े भाव-भंगिमा के साथ नृत्य की प्रस्तुति दी।तबले पर उस्ताद अकरम खां, पखावज पर महावीर गंगानी, सितार पर रईस खां ने संगत की। बोलपढ़ंत मयूख भट्टाचार्य और गायन समीउल्ला खां ने किया।