हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को दुनिया के सामने प्रभावशाली ढंग से नहीं रख पाए। विडंबना यह है कि हम अपनी जड़ों को भूलकर पश्चिम के पीछे भाग रहे हैं। यह बेबाक विचार रंगकर्मी पद्मश्री बलवंत ठाकुर ने व्यक्त किए। बुधवार को फतेहाबाद रोड स्थित अटल उद्यान में आयोजित दो दिवसीय ब्रजधरा साहित्य उत्सव के समापन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि रहे। उन्होंने कहा कि विदेशों में साहित्य और कला के प्रति जो जज्बा है, वह हमें अपने भीतर पैदा करना होगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि जब उन्होंने लंदन में कालिदास और नाट्यशास्त्र का जिक्र किया, तब वहां के लोगों का भारतीय साहित्य के प्रति भ्रम टूटा। उन्होंने कहा कि बच्चों के नाटक के नाम पर महज खानापूर्ति होती है, जबकि वास्तव में उनके लिए स्तरीय लेखन की जरूरत है। उन्होंने आगरा में अपने प्रसिद्ध नाटकों के मंचन की इच्छा भी जताई। उत्सव के समापन पर कवियों ने समां बांध दिया। अशोक रावत ने सफर का शौक है वो किलोमीटर नहीं गिनते, जो मंजिल तक पहुंचते हैं वो ठोकरें नहीं गिनते। वहीं रामेंद्र मोहन त्रिपाठी, डॉ. त्रिमोहन तरल ने भी काव्यपाठ किया। उत्सव के दूसरे दिन विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई। पहले सत्र में नारी लेखन पर डॉ. मधु भारद्वाज की देखरेख में महिलाओं के संघर्ष और अभिव्यक्ति पर चर्चा हुई। सिनेमा और रंगमंच पर डॉ. महेश धाकड़ के संयोजन में शब्द से पर्दे तक के सफर को रेखांकित किया गया। स्वास्थ्य और साहित्य पर कुमार ललित के सत्र में बताया गया कि साहित्य किस तरह मानसिक स्वास्थ्य के लिए औषधि है। शिक्षा और मशीन पर प्रो. जय सिंह नीरद ने कहा कि पहले मशीन ने मनुष्य को मशीन बनाया और अब वह उसे पदस्थापित करने की कोशिश कर रही है।