मथुरा के बलदेव क्षेत्र में नगला अकोस और संजा गांव के बीच किसानों के लिए राहत का पुल अब विवाद का पुल बन गया है। यमुना की बाढ़ में पिछले वर्ष बह गए दो पुलों के स्थान पर लोक निर्माण विभाग द्वारा नए पुलों का निर्माण कराया जा रहा है, लेकिन किसानों का आरोप है कि पुलों तक पहुंचने के लिए उनकी निजी कृषि भूमि को ही रास्ता बना दिया गया। किसानों के मुताबिक करीब चार हेक्टेयर जमीन निर्माण की चपेट में आ गई है और इसके एवज में उन्हें एक भी रुपया मुआवजा नहीं मिला है। किसानों का आरोप है कि विभाग ने सरकारी रास्ते की बजाय उनकी निजी कृषि भूमि में पुलों का निर्माण शुरू कर दिया। पहले उनकी जमीन से रास्ता बनाया गया और अब उसी रास्ते पर पुल निर्माण कराया जा रहा है। किसानों ने शासन और प्रशासन के तमाम अधिकारियों से शिकायत कर जमीन का मुआवजा दिलाने की मांग की, लेकिन सुनवाई नहीं होने पर आखिरकार उन्हें हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी। ग्रामीणों के अनुसार पिछले वर्ष यमुना की बाढ़ में नगला अकोस और संजा के बीच बने दोनों पुल बह गए थे। इसके बाद मथुरा में जन्माष्टमी समारोह में शामिल होने आए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दोनों पुलों के पुनर्निर्माण की घोषणा की थी। सरकार ने इनके निर्माण के लिए करीब 10.30 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत की। वर्तमान में लोक निर्माण विभाग के प्रांतीय खंड द्वारा दोनों पुलों का निर्माण कराया जा रहा है। किसानों का सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब निर्माण परियोजना के लिए उनकी निजी जमीन का इस्तेमाल किया जा रहा है तो भूमि अधिग्रहण और मुआवजे की व्यवस्था परियोजना में क्यों नहीं की गई? किसानों का कहना है कि जमीन उनकी है, लेकिन निर्माण विभाग उसे सरकारी रास्ता बताकर इस्तेमाल कर रहा है। वहीं लोक निर्माण विभाग के सहायक अभियंता बीडी शर्मा ने बताया कि नगला अकोस-संजा के बीच कई दशक से रास्ता बना हुआ था। उसी रास्ते पर पुलों का निर्माण कराया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि हाईकोर्ट द्वारा किसानों को मुआवजा देने का निर्देश दिया जाता है तो उसके अनुसार कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल पुलों का निर्माण तेजी से चल रहा है और दूसरी ओर किसान अपनी जमीन के अधिकार और मुआवजे के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि करोड़ों रुपये की परियोजना में पुल तो बन जाएंगे, लेकिन जिन किसानों की जमीन पर यह निर्माण खड़ा हो रहा है, उन्हें उनके हक का मुआवजा कब मिलेगा?