जोधपुर में सीबीआई की विशेष अदालत ने रिश्वतखोरी के एक मामले में आयकर विभाग के दो अधिकारियों को चार साल की सजा सुनाई है। दोनों पर 1.10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। वहीं, मामले में आरोपी बनाए गए एक जौहरी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। अदालत ने इसे गंभीर भ्रष्टाचार का मामला बताते हुए कहा कि ऐसे कृत्य सरकारी संस्थानों में जनता के विश्वास को कमजोर करते हैं।
2015 से जुड़ा है मामला
जानकारी के मुताबिक, यह मामला मार्च 2015 का है, जब तत्कालीन मुख्य आयकर आयुक्त पवन कुमार शर्मा और इंस्पेक्टर शैलेन्द्र भंडारी को सीबीआई ने गिरफ्तार किया था। इनके साथ जोधपुर के जौहरी चंद्र प्रकाश कट्टा को भी हिरासत में लिया गया था। कार्रवाई उस समय की गई, जब बाड़मेर के व्यवसायी किशोर जैन ने सीबीआई को शिकायत दी थी।
कर निर्धारण में गड़बड़ी कर मांगी गई रिश्वत
व्यवसायी जैन ने आरोप लगाया था कि अधिकारियों ने वित्त वर्ष 2012-13 के लिए उसकी कर देनदारी 2.5 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 12 करोड़ रुपये कर दी और उसे निपटाने के लिए रिश्वत की मांग की। शुरुआत में यह मांग 25 लाख रुपये की थी, जिसे बाद में घटाकर 23 लाख कर दिया गया। इस बीच, अपील अधिकारी ने जैन के पक्ष में आदेश भी दे दिया, लेकिन वरिष्ठ अधिकारी लगातार दबाव बनाते रहे।
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सीबीआई का जाल और रंगेहाथ गिरफ्तारी
शिकायत पर सीबीआई ने जाल बिछाया। 31 मार्च 2015 को इंस्पेक्टर भंडारी को कट्टा के शो-रूम पर 15 लाख रुपये लेते हुए रंगेहाथ पकड़ लिया गया। जांच में सामने आया कि यह रकम आयुक्त पवन कुमार शर्मा की ओर से ली जा रही थी। इसके बाद तीनों को गिरफ्तार किया गया।
अदालत का फैसला और कट्टा की रिहाई
सीबीआई ने तीनों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत आरोप लगाए। हालांकि विशेष अदालत ने चंद्र प्रकाश कट्टा को पर्याप्त सबूत न मिलने के कारण बरी कर दिया। शर्मा और भंडारी को दोषी मानते हुए चार साल की कैद और आर्थिक दंड की सजा सुनाई गई।
अलग मामले में भी कार्रवाई
सीबीआई ने उस समय शर्मा की देशभर में फैली आठ संपत्तियों पर भी छापे मारे थे। जांच में करोड़ों रुपये की अघोषित चल-अचल संपत्तियां मिलने पर उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का अलग मामला दर्ज किया गया था।
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