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गोंडा: दीये खुद बना रहे, मूर्तियों के लिए दूसरे शहरों पर निर्भर कारीगर
गोंडा: त्योहारों पर मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ी है, लेकिन पुश्तैनी माटीकला का कारोबार बाजार की बदलती पसंद के आगे पिछड़ रहा है। बहराइच रोड स्थित प्रजापतिपुरम के कारीगर दीये और कुल्हड़ तो खुद बना रहे हैं, लेकिन आकर्षक डिजाइन वाली मूर्तियां कोलकाता समेत दूसरे शहरों से मंगानी पड़ रही हैं। महंगी मिट्टी, अधिक मेहनत और कम मुनाफे ने स्थानीय उत्पादन की रफ्तार थाम दी है। इसका असर नई पीढ़ी के रुझान पर भी पड़ रहा है।
कभी दीपावली पर प्रजापतिपुरम में दीये, गुल्लक, कुल्हड़ और मूर्तियां बनाने का काम तेज हो जाता था। अब बाजार में नए डिजाइन और आकर्षक रंग-रूप वाले उत्पादों की मांग बढ़ी है। स्थानीय कारीगर इस पसंद के अनुरूप मूर्तियां तैयार नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में खुद मूर्तियां बनाने के बजाय बाहर से मंगाकर बेच रहे हैं।
युवा आदित्य प्रजापति बताते हैं कि उनका परिवार पीढ़ियों से माटीकला से जुड़ा है। पहले दीपावली पर मिट्टी के उत्पादों से अच्छी आमदनी हो जाती थी, लेकिन अब ग्राहकों की पसंद बदल गई है। मनपसंद डिजाइन और बनावट वाली मूर्तियां स्थानीय स्तर पर तैयार नहीं हो पा रही हैं। नए डिजाइन का प्रशिक्षण और आधुनिक तकनीक मिले तो स्थानीय कारीगर भी बाजार की मांग के अनुसार उत्पाद बना सकते हैं। बुजुर्ग कारीगर राम केवल प्रजापति बताते हैं कि मिट्टी की एक ट्रॉली तीन हजार रुपये में मिल रही है। मिट्टी तैयार करने, चाक पर आकार देने, सुखाने और पकाने में कई दिन लगते हैं। ढुलाई का खर्च अलग है। इतनी मेहनत और लागत के बाद मुनाफा बहुत कम बचता है। इस बार दीये और कुल्हड़ तो खुद बनाए हैं, लेकिन मूर्तियां बाहर से मंगानी पड़ी हैं।
जिला ग्रामोद्योग विभाग के अनुसार, वर्ष 2019 से अब तक 250 से अधिक कारीगरों को इलेक्ट्रिक चाक दिए गए हैं। इससे श्रम कम हुआ है और उत्पादन की गति बढ़ी है। जिला ग्रामोद्योग अधिकारी महेंद्र कुमार मिश्र ने बताया कि स्थानीय उत्पादों की बिक्री बढ़ाने और कारीगरों को बाजार उपलब्ध कराने के लिए प्रजापतिपुरम में मेले का आयोजन किया गया है। लोगों से स्थानीय कारीगरों के उत्पाद खरीदने की अपील भी की जा रही है।
इलेक्ट्रिक चाक मिलने से उत्पादन आसान हुआ है, लेकिन बदलती पसंद के अनुरूप डिजाइन तैयार करना और उत्पादों की बिक्री अब भी चुनौती है। कारीगरों को आधुनिक डिजाइन, गुणवत्ता और विपणन का प्रशिक्षण देने के साथ स्थायी बाजार उपलब्ध कराने की जरूरत है। स्थानीय उत्पादों का उचित मूल्य मिले तो आमदनी बढ़ेगी और नई पीढ़ी भी पुश्तैनी हुनर से जुड़ी रह सकेगी।
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