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कानपुर: शास्त्री भवन में गांधारी नाटक से हुई राष्ट्रीय नाट्य समारोह की शुरुआत
अनुकृति रंगमंडल के बैनर गुरुवार से राष्ट्रीय नाट्य समारोह की शुरुआत गांधारी नाटक से हुई। नाटक में गांधारी और कुंती संवाद ने दर्शकों को भावुक कर दिया। यह निष्कर्ष निकला कि पुरुषों के अहंकार के हर युद्ध की तबाही किसी न किसी गांधारी पर आती है। महाभारत के युद्ध से दोनों पक्षों को कुछ भी हासिल नहीं हुआ, साथ ही सर्वाधिक पीड़ा स्त्रियों को ही झेलनी पड़ी।
केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय एवं प्रदेश के संस्कृति निदेशालय के सहयोग से आयोजित समारोह का आयोजन शास्त्री भवन खलासी लाइन में किया गया। यहां लेखक जयवर्धन के नाटक का निर्देशन डॉ. ओमेंद्र कुमार ने किया। नाटक में हस्तिनापुर के ज्येष्ठ राजकुमार धृतराष्ट्र के नेत्रहीन होने और राज्य की जिम्मेदारी कनिष्ठ राजकुमार पांडु पर होने की परिस्थिति से कथा आगे बढ़ती है। भीष्म और सत्यवती धृतराष्ट्र के विवाह को लेकर चिंतित होते हैं। इसके बाद भीष्म सेना के साथ विजय यात्रा पर निकलते हैं और गांधार नरेश सुबल को सपरिवार बंदी बना लेते हैं।
भीष्म प्रस्ताव रखते हैं कि राजकुमारी चारुवदनी का विवाह धृतराष्ट्र से स्वीकार करने पर सुबल गांधार के राजा बने रहेंगे। प्रजा के हित में सुबल यह प्रस्ताव मान लेते हैं। पति के नेत्रहीन होने की जानकारी मिलने पर दुखी गांधारी जीवनभर अपनी आंखों पर पट्टी बांधने का संकल्प लेती हैं। कहानी में द्यूत क्रीड़ा के दौरान युधिष्ठिर सब कुछ हार जाते हैं। द्रौपदी के चीरहरण के समय कर्ण, दुर्योधन और दुशासन के अपमानजनक शब्दों से आहत द्रौपदी भीष्म, गुरु द्रोण, युधिष्ठिर, अर्जुन और भीम से सहायता मांगती हैं। सभी के मौन रहने पर वह कृष्ण को पुकारती हैं। कृष्ण दुर्योधन को चेतावनी देते हैं और गांधारी भी पुत्र को समझाने का प्रयास करती हैं, लेकिन युद्ध टल नहीं पाता।
युद्ध में गांधारी के 99 पुत्र मारे जाते हैं। संजय से दुर्योधन की देह सरोवर के किनारे पड़े होने की सूचना मिलने पर गांधारी अपनी आंखों की पट्टी खोलती हैं और आवेश में कृष्ण को शाप देती हैं। युद्ध के बाद कुंती उनसे मिलने आती हैं। दोनों के दुख और संवाद यह एहसास कराते हैं कि युद्ध की विजय के पीछे कितने परिवारों का विनाश छिपा होता है।
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