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हमीरपुर: रक्षाबंधन के साथ शुरू हुआ गुग्गा छत्री पर्व, ढोल-नगाड़ों की थाप पर गूंजे गुग्गा वीर के जयकारे
रक्षाबंधन के पावन पर्व के साथ ही हमीरपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में लोक आस्था से जुड़ा गुग्गा छत्री पर्व शुरू हो गया। पर्व के शुभारंभ पर ऊहल गांव में श्रद्धालुओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ गुग्गा जी की पूजा-अर्चना की। गांव में दिनभर धार्मिक माहौल बना रहा और ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच गुग्गा वीर के जयकारे गूंजते रहे।
ऊहल में गुग्गा जी की छड़ी और छत्री को विधिवत सजाया गया। इसके बाद श्रद्धालु इसे लेकर घर-घर पहुंचे। ग्रामीणों ने श्रद्धा के साथ गुग्गा जी का आशीर्वाद लिया और अपने परिवार की सुख-शांति, खुशहाली व समृद्धि की कामना की। इस दौरान पारंपरिक लोकगीतों और वाद्य यंत्रों की धुनों ने पर्व के माहौल को और भक्तिमय बना दिया।
गुग्गा छत्री पर्व के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में श्रद्धालु पारंपरिक तरीके से गुग्गा जी की छड़ी और छत्री को सजाकर घर-घर लेकर जाते हैं। लोग श्रद्धा के साथ पूजा करते हैं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रसाद अर्पित करते हैं। इस परंपरा में धार्मिक आस्था के साथ ग्रामीण संस्कृति की झलक भी देखने को मिलती है।
ऊहल गांव में भी ग्रामीणों ने परंपरा को आगे बढ़ाते हुए पूरे उत्साह के साथ पर्व में भाग लिया। ढोल-नगाड़ों की आवाज के साथ निकली गुग्गा जी की छत्री के दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण जुटे और पूजा-अर्चना में शामिल हुए।
हिमाचल प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में गुग्गा छत्री पर्व को लोक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़कर देखा जाता है। यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि गांव के लोगों को एक साथ आने और आपसी मेल-जोल बढ़ाने का अवसर भी देता है।
पर्व के दौरान ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में सजकर ढोल और अन्य वाद्य यंत्रों के साथ गुग्गा जी की छत्री लेकर निकलते हैं। कई जगहों पर श्रद्धालु गुग्गा जी के दरबार में पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और प्रसाद चढ़ाते हैं।
गुग्गा छत्री पर्व ग्रामीण समाज की उन परंपराओं में शामिल है, जिन्हें लोग आज भी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं। आधुनिक दौर में भी ऐसे लोकपर्व गांवों की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। रक्षाबंधन के साथ शुरू हुए इस पर्व में ऊहल गांव के लोगों ने भी उत्साह और आस्था के साथ भाग लेकर अपनी परंपरा को जीवंत रखा।
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