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When the *sakhis* (female companions) refused to offer the *goras* (dairy offering), Kanha smashed the pot; devotees flocked to partake of the curd *prasad*.
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VIDEO: सखियों ने नहीं दिया गोरस का दान तो कान्हा ने फोड़ दी मटकी, दही के प्रसाद को उमड़े श्रद्धालु
बरसाना। सांकरी खोर में कान्हा ने सखियों का रास्ता रोककर गोरस का दान मांगा तो सखियों ने साफ इनकार कर दिया। सिर पर दही की यू मटकी संभाले सखियां आगे बढ़ने लगीं तो कान्हा भी ग्वाल-बालों के साथ मटकी तक पहुंच गए। सखियों ने दोनों हाथों से मटकी बचाने की कोशिश की। कुछ पल की खींचतान के बाद कान्हा ने मटकी पर हाथ मारा और पलभर में दही की धार जमीन पर बिखर गई। मटकी फूटते ही श्रद्धालु दही को प्रसाद मानकर लेने के लिए उमड़ पड़े। जयकारों से सांकरी खोर गूंज उठी और ब्रज की दान लीला जीवंत हो उठी।
राधारानी की प्रिय सखी चित्रा के गांव चिकसोली में होने वाली मटकी फोड़ दान लीला बूढ़ी लीला महोत्सव की प्रमुख लीलाओं में शामिल है। ब्रज की मान्यता है कि माखन चोरी लीला के लिए कान्हा ग्वाल-बालों के साथ सांकरी खोर पहुंचते थे। मथुरा की ओर दूध-दही लेकर जाने वाली सखियों का रास्ता रोककर उनसे गोरस का दान मांगते थे। सखियां दान देने से इनकार करतीं तो कान्हा उनकी मटकी फोड़ देते थे।
समाज गायन से सजा लीला का वातावरण
लीला से पहले रास मंडल में बरसाना और नंदगांव के गोस्वामी समाजियों ने समाज गायन किया। राधा पर्वत और कृष्ण पर्वत पर आमने-सामने बैठे समाजियों के पदों, हास्य-परिहास और ब्रज की रसभरी गालियों से वातावरण लीला के रंग में रंग गया। इसके बाद चित्रा सखी के गांव से बैंड-बाजों के साथ गोरस की मटकी लीला स्थल पर लाई गई। मटकी पहुंचते ही श्रद्धालुओं की नजरें लीला स्थल पर टिक गईं।
सखियां मटकी लेकर संकरी राह से आगे बढ़ीं तो कान्हा ने उनका रास्ता रोक लिया। उन्होंने गोरस का दान मांगा, लेकिन सखियों ने देने से मना कर दिया। कान्हा मटकी की ओर बढ़े तो सखियां उसे बचाने लगीं। कभी मटकी एक ओर झुकती तो कभी सखियां उसे दोनों हाथों से थाम लेतीं। ग्वाल-बाल भी कान्हा का साथ देते रहे। आखिर में कान्हा ने स्वयं मटकी फोड़ दी। दही बिखरते ही श्रद्धालु उसे प्रसाद मानकर हथेलियों और आंचल में समेटने लगे।
कंस के यहां जाने वाले गोरस को रोकने का भाव
स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार द्वापर में ब्रज का दूध-दही मथुरा कंस के यहां जाता था। इसी को रोकने के भाव से कान्हा ने गोरस दान की लीला की थी। इसी परंपरा की स्मृति में आज भी सांकरी खोर में मटकी फोड़ दान लीला होती है। ब्रजवासियों के लिए यह केवल लीला का मंचन नहीं, बल्कि द्वापर की लीला का जीवंत स्मरण है।
मटकी फूटने तक श्रीजी को नहीं लगता राजभोग
मटकी फोड़ दान लीला की खास परंपरा लाडली जी मंदिर से जुड़ी है। मटकी फूटने तक श्रीजी को राजभोग नहीं लगाया जाता। सेवायत रासबिहारी गोस्वामी के अनुसार लीला-भाव में उस समय युगल सरकार सांकरी खोर में होते हैं। इसलिए कान्हा के हाथों मटकी फूटने के बाद ही श्रीजी को राजभोग लगाया जाता है। सामान्य दिनों में राजभोग आरती करीब एक बजे होती है, जबकि मटकी फोड़ लीला वाले दिन इसका समय करीब दो बजे हो पाती है।
दो पर्वतों के बीच गोरस का दान मांगते कान्हा, मटकी बचाती सखियां और अंत में कान्हा के हाथों फूटती दही की मटकी। दही के प्रसाद के लिए बढ़ती श्रद्धालुओं की हथेलियां और जयकारों से गूंजती सांकरी खोर ने एक बार फिर ब्रज की पुरानी दान लीला को जीवंत कर दिया।
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