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The fame of Garhi Ujale Khan has reached foreign shores, carried by the melody of the *been*.
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बीन की धुन से विदेशों तक पहुंची गढ़ी उजाले खां की पहचान, छह पीढ़ियों से सहेजी जा रही लोक कला की विरासत
गांव गढ़ी उजाले खां अपनी उत्कृष्ट शिक्षा, राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों और देश की सेवा में समर्पित सैनिकों के लिए जाना जाता है। वहीं यह गांव अपनी समृद्ध संगीत परंपरा के कारण भी विशेष पहचान रखता है। यहां करीब छह पीढ़ियों से संगीत की विरासत को संजोए हुए लगभग 21 परिवार निवास करते हैं, जिन्होंने नृत्य, गायन और वादन की विभिन्न विधाओं में देशभर में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है।
गांव के प्रसिद्ध लोक कलाकार मास्टर धन सिंह बीन वादन के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। बीन के अलावा वे बांसुरी, बैंजो, हारमोनियम, नगाड़ा, तबला और तुम्बी जैसे कई वाद्य यंत्रों को बजाने में दक्ष हैं। उन्होंने लोकगीत गायन और शास्त्रीय संगीत की अनेक प्रस्तुतियां दी हैं। उनकी संगीत साधना और योगदान को देखते हुए वर्ष 2012 में उन्हें हरियाणा का प्रतिष्ठित पंडित लख्मीचंद अवार्ड प्रदान किया गया। मास्टर धन सिंह ने न केवल देश के विभिन्न मंचों पर बल्कि विदेशों में भी हरियाणवी लोक संगीत और बीन वादन की पहचान स्थापित की है।
गांव के ही सुरेश चंदेला संगीत शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। उन्होंने गढ़ी उजाले खां में संगीत अकादमी स्थापित कर सैकड़ों विद्यार्थियों को हारमोनियम, ढोलक, तबला, चोंगो और गिटार जैसे वाद्य यंत्रों का प्रशिक्षण दिया है। उनकी अकादमी ग्रामीण क्षेत्र में संगीत प्रतिभाओं को निखारने का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुकी है।
इसी कड़ी में राकेश सोढ़ी का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। भजन और लोक संगीत गायन के क्षेत्र में पहचान बना चुके राकेश सोढ़ी संगीत में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त कर वर्तमान में करनाल में संगीत प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं। उनका कहना है कि गांव के अधिकांश परिवार पीढ़ियों से संगीत, नृत्य और गायन से जुड़े हुए हैं। संगीत शिक्षा के एक और विद्यार्थी संगम चंदेला सितार वाद्य में बीए कर चुके हैं और एमए के द्वितीय वर्ष में हैं। शास्त्रीय संगीत का वाद्य सितार उनका प्रिय विषय है और वो इसको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बजाने का सपना संजोए हैं। आज यहां पारंपरिक संगीत को आधुनिक शिक्षा से जोड़कर नई पीढ़ी को संगीत के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। यही कारण है कि गढ़ी उजाले खां आज भी अपनी सांस्कृतिक और संगीत विरासत को सहेजे हुए है।
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