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कैप्टन सुल्तान सिंह ने ऑपरेशन सर्प विनाश में 13 आतंकियों को उतारा था मौत के घाट
गांव सीसवाला निवासी ऑनरेरी कैप्टन सुलतान सिंह के शरीर में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान लगी गोलियों के छर्रे आज भी मौजूद हैं। आतंकियों से 20 से अधिक बार सीधी मुठभेड़ में अपनी टुकड़ी का नेतृत्व कर चुके सुलतान सिंह को बहादुरी और उत्कृष्ट सेवाओं के लिए भारतीय सेना ने वर्ष 2011 में सेना मेडल से सम्मानित किया। वह भारतीय शांति सेना में शामिल होकर श्रीलंका भी गए और लंबे समय तक पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की सुरक्षा में तैनात रहे। सुल्तान सिंह बताते हैं कि मार्च 2003 में आतंकियों ने पुंछ क्षेत्र की एक पहाड़ी पर कब्जा कर रखा था। इसी क्षेत्र से पाकिस्तानी आतंकी भारत में घुसपैठ करते थे। आतंकियों के लॉन्चिंग पैड को नष्ट करने के लिए भारतीय सेना ने सीमा से करीब 20 किलोमीटर अंदर हिलकाका क्षेत्र में ऑपरेशन सर्प विनाश शुरू किया। सूचना मिली थी कि वहां लगभग 300 आतंकी छिपे हैं। इस अभियान में उनकी यूनिट 9 पैरा स्पेशल फोर्सेज सबसे आगे थी। यूनिट की तीन टुकड़ियां बनाई गईं जिनमें से एक का नेतृत्व उन्हें सौंपा गया। आतंकी 17 से 18 हजार फीट ऊंचाई पर बंकर बनाकर बैठे थे। भारतीय सेना जैसे ही आगे बढ़ती वे हमला कर देते। इससे सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इसके बावजूद किसी तरह उनकी टुकड़ी आतंकियों के बहुत करीब पहुंच गई। चारों ओर से लगातार गोलीबारी हो रही थी और अंधेरा होने के कारण तत्काल सहायता भी नहीं मिल पा रही थी। करीब आधे घंटे तक मुठभेड़ चली। सेना की सहायता के लिए हेलीकॉप्टर पहुंचे। इस अभियान में 13 आतंकी मारे गए और छह को पकड़ लिया गया। यह ऑपरेशन 20 मार्च से 24 मार्च 2003 तक चला। इस साहसिक अभियान में उल्लेखनीय भूमिका निभाने पर उन्हें सेना मेडल प्रदान किया गया।
दसवीं कक्षा में ही तय कर लिया था कि सेना में जाना है
सुलतान सिंह ने बताया कि मेरा पिता किसान थे। सेना में भर्ती होकर देश सेवा करने का सपना मैंने बचपन से ही देखा था। वर्ष 1981 में दसवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद सेना भर्ती में भाग लिया और चयनित हो गया। इसके बाद 9 पैरा स्पेशल फोर्सेज का हिस्सा बने। सेना में लंबे कार्यकाल के दौरान उन्होंने देश के 10 से अधिक राज्यों में सेवाएं दीं। जम्मू-कश्मीर में सबसे अधिक समय तक तैनाती रही।
ऑपरेशन ब्लू स्टार से जुड़े अभियानों में निभाई भूमिका
सुलतान सिंह ने बताया कि वर्ष 1982 में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) का गठन नहीं हुआ था। उस समय विशेष अभियानों की जिम्मेदारी स्पेशल ग्रुप संभालता था। पंजाब में आतंकवाद के दौर में वह ऑपरेशन ब्लू स्टार से जुड़े अभियानों का हिस्सा रहे। वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कुछ समय के लिए राजीव गांधी की सुरक्षा में तैनात किया गया। वर्ष 1988 में भारतीय शांति सेना के सदस्य के रूप में श्रीलंका भेजा गया। वहां एलटीटीई के आतंकियों द्वारा लगातार हमले किए जाते थे। दिसंबर 1988 में एक अभियान के दौरान उनकी टुकड़ी जंगल में घात लगाकर बैठी थी। जैसे ही आतंकियों की गतिविधि का पता चला दोनों ओर से गोलीबारी शुरू हो गई। इस दौरान उन्हें छर्रे लगे। करीब दो महीने तक अस्पताल में भर्ती रहे और दो ऑपरेशन किए गए। चिकित्सकों ने आंख के पास लगे छर्रों को निकालने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि इससे आंख की रोशनी को नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे में ये छर्रे आज भी मौजूद है।
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