झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और अंग्रेजों के बीच हुए भीषण युद्ध की वीरगाथा आज भी ग्वालियर की धरती पर जीवंत है। कहा जाता है कि युद्ध में रानी लक्ष्मीबाई के वीरगति को प्राप्त होने के बाद अंग्रेज उनके पार्थिव शरीर को अपने कब्जे में लेना चाहते थे। लेकिन गंगादास की बड़ी शाला के साधु-संतों ने अंग्रेजों से मोर्चा लिया और रानी की मृत देह की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
मान्यता के अनुसार, करीब 745 साधु-संतों ने अंग्रेजी सेना से लड़ते हुए बलिदान दिया, लेकिन रानी लक्ष्मीबाई का पार्थिव शरीर अंग्रेजों के हाथ नहीं लगने दिया। यही वजह है कि ग्वालियर की गंगादास की बड़ी शाला आज भी इस ऐतिहासिक शौर्य और बलिदान की गवाह मानी जाती है।
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गंगादास की बड़ी शाला में आज भी सुरक्षित हैं युद्ध के निशान
ग्वालियर स्थित गंगादास की बड़ी शाला में उन साधु-संतों की वीरता से जुड़ी कई ऐतिहासिक वस्तुएं आज भी सुरक्षित बताई जाती हैं। इनमें तलवारें और अंग्रेजों के खिलाफ इस्तेमाल की गई तोप भी शामिल है। विजयादशमी के अवसर पर इन्हीं ऐतिहासिक अस्त्र-शस्त्रों का विधि-विधान से पूजन किया गया। साधु-संतों ने पहले शस्त्रों की पूजा की और इसके बाद उस तोप का भी पूजन किया, जिसका इस्तेमाल अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष के दौरान किए जाने की परंपरा बताई जाती है।
हनुमान जी की पूजा कर शहीद साधुओं को किया याद
विजयादशमी के मौके पर गंगादास की बड़ी शाला में हनुमान जी की विशेष पूजा-अर्चना भी की गई। इसके साथ ही अंग्रेजों से संघर्ष के दौरान शहीद हुए साधु-संतों को श्रद्धापूर्वक याद किया गया। शस्त्र पूजन के दौरान साधु-संतों ने कहा कि विजयादशमी केवल असत्य पर सत्य की जीत का पर्व नहीं है, बल्कि यह शौर्य, शक्ति और बलिदान को याद करने का अवसर भी है।
गंगादास की बड़ी शाला में मौजूद ये ऐतिहासिक अस्त्र-शस्त्र आज की पीढ़ी को उस दौर की याद दिलाते हैं, जब साधु-संतों ने भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा संभाला था। विजयदशमी पर इनका पूजन कर उन बलिदानियों को नमन किया गया, जिन्होंने रानी लक्ष्मीबाई की पार्थिव देह की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।