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मंडी: सायर पर आज गूंजेंगी कमरुघाटी के देवालयों में मंगल घंटियां
Ankesh Dogra
Updated Wed, 16 Sep 2026 04:19 PM IST
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सायर पर्व के अवसर पर कमरुघाटी के देवालयों में गुरुवार को एक बार फिर मंगल घंटियां गूंजेंगी। मंडी जनपद के उपमंडल गोहर क्षेत्र में स्थित बड़ा देव कमरुनाग, शिकारी देवी सहित प्रमुख देवस्थलों के कपाट एक माह के देव विश्राम काल के बाद श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे।
देवालयों के कपाट खुलने को लेकर क्षेत्र के श्रद्धालुओं में खासा उत्साह है। सुबह विधिवत पूजा-अर्चना के बाद जैसे ही देवस्थलों के कपाट खुलेंगे, स्थानीय लोगों के साथ दूर-दराज क्षेत्रों से पहुंचने वाले भक्त भी अपने आराध्य देवताओं के दर्शन करेंगे और आशीर्वाद प्राप्त करेंगे।
देव परंपरा के अनुसार भाद्रपद मास में एक माह के लिए देवालयों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। स्थानीय स्तर पर इस अवधि को देव विश्राम काल कहा जाता है। मान्यता है कि इस दौरान देवता आंतरिक साधना और विश्राम करते हैं। इस अवधि में सार्वजनिक रूप से पूजा-अर्चना और देव दर्शन की परंपरा बंद रहती है।
सायर पर्व के शुभ अवसर पर गुरुवार सुबह पहाड़ों पर पहली किरण पड़ते ही देवस्थलों में पूजा-अर्चना का क्रम शुरू होगा। इसके बाद विधिवत रूप से कपाट खोले जाएंगे। कपाट खुलने के साथ ही देवालयों में मंगल घंटियां बजेंगी और श्रद्धालु देव दरबार में शीश नवाएंगे।
भक्तजन अपने परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और अच्छी फसल की कामना करेंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में सायर पर्व का संबंध ऋतु परिवर्तन, नई फसल और देव आस्था से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में देवालयों के कपाट खुलने का दिन स्थानीय लोगों के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से विशेष महत्व रखता है।
बड़ा देव कमरुनाग कमरुघाटी और आसपास के क्षेत्रों के प्रमुख आराध्य देवताओं में शुमार हैं। सायर पर्व पर कपाट खुलने के बाद कमरुनाग देवता के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। एक माह बाद देव दर्शन होने के कारण भक्तों में विशेष उत्साह रहता है।
कमरुनाग और शिकारी देवी जैसे देवस्थल धार्मिक आस्था के साथ-साथ मंडी की समृद्ध देव संस्कृति और पारंपरिक मान्यताओं के प्रतीक भी हैं। इन देवालयों में कपाट खोलने और बंद करने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है।
सायर पर्व पर देव विश्राम के बाद देवालयों के कपाट खोलने की परंपरा में ऋतुचक्र, प्राकृतिक परिस्थितियों और देव आस्था का अनूठा समन्वय देखने को मिलता है। यह परंपरा क्षेत्र की लोक संस्कृति को जीवंत बनाए रखने के साथ नई पीढ़ी को भी अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ती है।
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