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Eyes welled up with tears at the moment the vow was taken; everyone was reminded of Ramesh Baba as the Radharani Braj Chaurasi Kos Yatra commenced with a Kanya Pujan (worship of young girls).
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VIDEO: राधारानी ब्रज चौरासी कोस यात्रा की शुरुआत, संत रमेश बाबा को याद कर नम हो गईं श्रद्धालुओं की आंखें
राधारानी ब्रज चौरासी कोस यात्रा का संकल्प लेने के लिए शनिवार को मान मंदिर गोशाला में श्रद्धालु जुटे थे। कन्या पूजन के बाद यात्रा का संकल्प लिया जाने लगा, लेकिन इस बार माहौल पहले जैसा नहीं था। वर्षों तक जिस यात्रा में संत रमेश बाबा का सानिध्य श्रद्धालुओं को मिलता रहा, इस बार वही बाबा उनके बीच नहीं थे। संकल्प की घड़ी आई तो उनकी यादें ताजा हो गईं। बाबा के गोलोकगमन के बाद पहली बार उनकी अनुपस्थिति में यात्रा आगे बढ़ रही थी। श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं, लेकिन संकल्प कमजोर नहीं पड़ा। सभी ने प्रण लिया कि गरीब भक्तों को ब्रज दर्शन कराने के लिए बाबा ने जो परंपरा शुरू की थी, उसे रुकने नहीं दिया जाएगा। संकल्प के बाद श्रद्धालुओं ने बरसाना की राधा-कृष्ण लीलास्थलियों के दर्शन किए और ब्रज यात्रा की शुरुआत की। मान मंदिर सेवा संस्थान की यात्रा-सारिणी के अनुसार, पहले दिन करीब नौ किलोमीटर की यात्रा निर्धारित है। इसमें सूर्यकुंड, ढमाला, नौबीरी-चौबीसी, रत्नकुंड और श्यामशिला के दर्शन शामिल हैं। ब्रज की इन लीलास्थलियों से जुड़ी मान्यताओं का स्मरण करते हुए श्रद्धालु राधा-कृष्ण की लीलाओं को नमन करते हैं। ब्रज चौरासी कोस का क्षेत्र करीब 252 किलोमीटर में फैला है। इसमें 12 प्रमुख वन, 24 उपवन और सैकड़ों कुंड, सरोवर तथा लीलास्थलियां हैं। रमेश बाबा ने वर्ष 1988 में इस यात्रा की शुरुआत इस भावना के साथ की थी कि कोई भक्त केवल धन की कमी के कारण ब्रज दर्शन से वंचित न रहे। यात्रा में भोजन, सुबह की चाय-नाश्ता और ठहरने की व्यवस्था निशुल्क रहती है। श्रद्धालुओं का सामान अगले पड़ाव तक पहुंचाने की व्यवस्था भी की जाती है। बाबा के लिए यह आयोजन मात्र यात्रा नहीं, बल्कि राधारानी की सेवा और भक्तों को ब्रज से जोड़ने का माध्यम था। आज उनके शिष्य और ब्रजवासी उसी जिम्मेदारी को निभाने के लिए आगे आए हैं। संकल्प के समय नम हुई आंखों के बीच एक बात स्पष्ट थी कि बाबा का सानिध्य भले ही अब न मिले, लेकिन उनके द्वारा शुरू की गई सेवा यात्रा नहीं रुकेगी। ब्रज की राह पर बढ़ते श्रद्धालुओं के कदम अब उनके उसी संकल्प को आगे ले जा रहे हैं, जिसे रमेश बाबा ने अपना जीवन समर्पित किया था।
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