नर्मदापुरम केंद्रीय जेल से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रही एक महिला बंदी ने अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में शिशु को जन्म दिया। लेकिन, जन्म के महज दस घंटे बाद ही शिशु की जिंदगी थम गई। जेल अभिरक्षा से जुड़े इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासन को भी कटघरे में ला खड़ा किया है। मामले में अब न्यायिक जांच शुरू कर दी गई है।
जानकारी के अनुसार महिला बंदी और उसका पति वर्ष 2017 से हत्या के प्रकरण में सजा काट रहे हैं। दोनों सीहोर जिले के शाहगंज क्षेत्र के निवासी बताए गए हैं। जेल प्रशासन के मुताबिक दोनों को नियमानुसार समय-समय पर पैरोल दी जाती रही है। अगस्त 2025 में वे निर्धारित अवधि के लिए जेल से बाहर गए थे और इसी दौरान महिला गर्भवती हुई।
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जेल नियमों के तहत गर्भावस्था की नियमित स्वास्थ्य जांच कराई जाती रही। करीब 20 सप्ताह पूरे होने पर महिला बंदी का टारगेट स्कैन कराया गया। इस जांच में भ्रूण में जन्मजात विकृति पाई गई। चिकित्सकीय रिपोर्ट में शिशु को ‘ईसोफेगल एट्रेशिया’ (Esophageal Atresia) नामक बीमारी से ग्रसित बताया गया, जो भोजन नली के विकास से जुड़ी गंभीर जन्मजात समस्या होती है। राज्य स्तरीय मेडिकल बोर्ड की अनुमति के बाद महिला को विशेष चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया।
बुधवार सुबह महिला बंदी को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हुई। उसे एंबुलेंस के माध्यम से जिला अस्पताल ले जाया जा रहा था, तभी रास्ते में ही उसने करीब सात माह के प्री-मैच्योर शिशु को जन्म दिया। समय से पूर्व जन्म और जन्मजात बीमारी के कारण शिशु की हालत अत्यंत नाजुक थी। अस्पताल में डॉक्टरों ने उपचार शुरू किया, लेकिन जन्म के लगभग दस घंटे बाद शिशु ने दम तोड़ दिया।
चूंकि मामला जेल अभिरक्षा से जुड़ा था, इसलिए नियमानुसार मजिस्ट्रियल जांच प्रारंभ की गई। तहसीलदार की उपस्थिति में शिशु के शव का पोस्टमार्टम कराया गया। पोस्टमार्टम के बाद शिशु का शव परिजनों को सुपुर्द कर दिया गया। कोतवाली पुलिस ने मर्ग कायम कर मामले की विवेचना शुरू कर दी है। इस पूरे मामले में उप जेल अधीक्षक का कहना है कि महिला बंदी को सभी आवश्यक चिकित्सकीय सुविधाएं उपलब्ध कराई गई थीं। प्रसव पीड़ा शुरू होने पर तत्काल अस्पताल ले जाया गया, लेकिन शिशु प्री-मैच्योर और गंभीर बीमारी से ग्रसित होने के कारण जीवित नहीं रह सका। मामले में नियमानुसार कार्रवाई की जा रही है।