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मध्य प्रदेश: लंबित प्रकरणों के निराकरण के लिए नहीं जारी कर सकते गाइडलाइन, हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका
Wed, 23 Sep 2026 11:06 PM IST
जबलपुर ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: जबलपुर ब्यूरो
Updated Wed, 23 Sep 2026 11:06 PM IST
सार
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने लंबित प्रकरणों के जल्द निपटारे के लिए तय गाइडलाइन बनाने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी। चीफ जस्टिस अल्पेश वाई कोगजे और जस्टिस विवेक रूसिया की पीठ ने कहा कि मामलों में देरी के कई कारण हैं और एक तय फॉर्मूले से सभी मामलों का निपटारा संभव नहीं है।
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मप्र हाईकोर्ट
- फोटो : फाइल फोटो
विस्तार
न्यायालय में लंबित प्रकरण के निराकरण के संबंध में गाइड लाइन निर्धारित किए जाने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अल्पेश वाई कोगजे तथा जस्टिस विवेक रूसिया की युगलपीठ ने सुनवाई के बाद याचिका को खारिज कर दिया। युगलपीठ ने आदेश में कहा है कि लंबित प्रकरणों के जल्द निपटारे के लिए कोई एक तय फॉर्मूला के तहत गाइडलाइन नहीं बनाई जा सकती है। उक्त आदेश के साथ युगलपीठ ने याचिका का निराकरण कर दिया।
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बता दें कि जबलपुर निवासी अधिवक्ता आनंद चावला की तरफ से दायर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश का हवाला देते हुए सिविल कोर्ट और हाई कोर्ट में लंबित प्रकरणों निपटाने में होने वाली देरी को रोकने के लिए गाइडलाइंस निर्धारित किए जाने की मांग की गई थी। याचिका में कहा गया था कि लोग न्याय का इंतज़ार करते हैं और कोर्ट द्वारा बार-बार और गैर-जरूरी स्थगन दिए जाने के कारण प्रकरण के फैसले में देरी होती है। अंतरिम अर्जी पर फैसला लेने में कोर्ट को कम से कम तीन से चार महीने का समय लगता है। इसके अलावा बेकार या झूठे केस करने या झूठा हलफनामा दाखिल करने पर भारी जुर्माना लगाने का कोई प्रावधान नहीं है।
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युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि मध्य प्रदेश राज्य में जजों और केसों की संख्या का अनुपात बहुत ज्यादा है। सिविल कोर्ट में मंज़ूर पदों के हिसाब से जजों की नियुक्ति नहीं हो पाती है, क्योंकि ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, कोर्ट-रूम की कमी, मिनिस्ट्रियल स्टाफ़ के पद खाली होना आदि वजहें हैं। युगलपीठ ने आदेश में कहा है कि ऐसा कोई आधार नहीं है कि स्थगन या दूसरी पार्टी को सुनवाई का मौका दिए बिना अर्जी पर फैसला करने के संबंध में व्यापक निर्देश जारी किए जा सकते हैं। अंतरिम अर्जी दाखिल करने को नियंत्रित करने के लिए कोर्ट के पास कोई तयशुदा फॉर्मूला नहीं है। सिविल केस में किसी पक्ष की तरफ से अर्ज़ी दाखिल की जाती है, तो संबंधित जज को सुनवाई का मौका देने और दूसरी पार्टी से जवाब मांगने के बाद ही अर्ज़ी पर फैसला करना होता है।
केसों के निपटारे में देरी की वजह सिर्फ सुनवाई टालना नहीं है, बल्कि ऊपर बताई गई दूसरी वजहें भी हैं। युगलपीठ ने उक्त आदेश के साथ याचिका को खारित कर दिया।
