{"_id":"6ae046150b4e7c55f602ae81","slug":"video-kasauli-dagshai-stepwell-puja-waste-water-source-environment-protection-2026-10-27","type":"video","status":"publish","title_hn":"सोलन: कसौली में बावड़ी में फेंकी जा रही पूजा सामग्री, सूखते जलस्रोत पर मंडराया संकट","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सोलन: कसौली में बावड़ी में फेंकी जा रही पूजा सामग्री, सूखते जलस्रोत पर मंडराया संकट
Ankesh Dogra
Updated Tue, 27 Oct 2026 12:05 PM IST
Link Copied
धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का ध्यान रखना भी जरूरी है। दशहरा और शारदीय नवरात्र के समापन के बाद डगशाई छावनी परिषद क्षेत्र के अंतर्गत कुमारहट्टी-डगशाई मार्ग पर स्थित एक पारंपरिक बावड़ी की दयनीय स्थिति सामने आई है। कभी राहगीरों और स्थानीय लोगों की प्यास बुझाने वाला यह जलस्रोत भूजल स्तर गिरने के कारण पहले ही सूखने की कगार पर है। अब इसमें पूजा सामग्री, पॉलिथीन, नारियल और कपड़े डाले जाने से इसकी स्थिति और गंभीर हो गई है।
इस मामले में छावनी प्रशासन से तत्काल संज्ञान लेने की मांग की गई है। बावड़ी की सफाई करवाने, उसके मुहाने पर सुरक्षा जाली लगाने और जलस्रोत में किसी भी तरह की सामग्री डालने पर रोक लगाने की जरूरत बताई गई है।
धार्मिक परंपराओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना समय की आवश्यकता है। हमारी अनेक परंपराएं प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन से जुड़ी रही हैं। हालांकि, बदलती परिस्थितियों में उनके व्यावहारिक तरीकों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
बढ़ती आबादी, प्राकृतिक जलस्रोतों के सिमटने और पूजा सामग्री के स्वरूप में बदलाव के बीच धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी निभाना महत्वपूर्ण हो गया है। परंपराओं के मूल भाव को समझते हुए ऐसे तरीके अपनाने की जरूरत है, जिनसे प्रकृति को नुकसान न पहुंचे।
पारंपरिक बावड़ियों में पानी सीमित मात्रा में होता है और उसका बहाव नदियों की तरह तेज नहीं होता। ऐसे में फूल-पत्तियां, नारियल, कपड़े और अन्य पूजा सामग्री लंबे समय तक पानी में पड़े रहने से जल की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। इससे दुर्गंध और गंदगी की समस्या भी पैदा हो सकती है।
इसके अलावा, पॉलिथीन और दूसरी अजैविक वस्तुएं बावड़ी की तलहटी में जमा होने से प्राकृतिक जलस्रोतों को नुकसान पहुंच सकता है। जल-छिद्रों के अवरुद्ध होने की आशंका भी बनी रहती है। ऐसे में बावड़ियों की नियमित सफाई और उनमें कचरा डालने पर रोक लगाना जरूरी है।
धार्मिक आस्था बनाए रखते हुए पूजा सामग्री के सुरक्षित निस्तारण के कई विकल्प अपनाए जा सकते हैं। पूजा में इस्तेमाल किए गए फूल, बेलपत्र और दूर्वा को उपयुक्त स्थान पर मिट्टी में मिलाया जा सकता है, जहां वे प्राकृतिक खाद का रूप ले सकें।
कलश पर रखे नारियल और साबुत बीजों को ठहरे पानी में डालने के बजाय उपयुक्त स्थान पर रोपने का विकल्प भी अपनाया जा सकता है। वहीं, पूजा सामग्री के साथ आने वाली पॉलिथीन, प्लास्टिक की पैकेजिंग और सिंथेटिक धागों को अलग करके निर्धारित कचरा प्रबंधन व्यवस्था के तहत निस्तारित करना चाहिए।
कुमारहट्टी-डगशाई मार्ग पर स्थित इस पारंपरिक जलस्रोत को बचाने के लिए छावनी प्रशासन से जल्द कार्रवाई करने की मांग की गई है। बावड़ी से पूजा सामग्री और अन्य कचरा हटाने के साथ उसके मुहाने पर सुरक्षा जाली लगाने की जरूरत बताई गई है, ताकि भविष्य में लोग इसमें कचरा या पूजा सामग्री न डाल सकें।
पारंपरिक जलस्रोत केवल पानी की उपलब्धता का साधन नहीं, बल्कि स्थानीय विरासत का हिस्सा भी हैं। इन्हें स्वच्छ और सुरक्षित रखना सामूहिक जिम्मेदारी है। धार्मिक परंपराओं का सम्मान करते हुए पर्यावरण संरक्षण के उपाय अपनाना ही ऐसे जलस्रोतों को बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम वीडियो सिर्फ सब्सक्राइबर्स के लिए उपलब्ध है
प्रीमियम वीडियो
सभी विशेष आलेख
फ्री इ-पेपर
सब्सक्राइब करें
Next Article
Disclaimer
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।