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अमेठी: 117 साल से रावण बनाकर गंगा-जमुनी तहजीब सहेज रहा नसीर का परिवार
अमेठी सिटी: रावण का पुतला जलता है तो बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश गूंजता है। गौरीगंज में इस परंपरा की एक और खास कहानी है। यहां रावण का पुतला बनाने वाले हाथ मुस्लिम कारीगर नसीर अहमद के हैं। उनके परिवार की कई पीढ़ियां इस काम से जुड़ी हैं। वर्ष 1909 से चली आ रही दशहरा मेले की परंपरा में परिवार की भागीदारी आपसी सद्भाव और गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल बनी हुई है। नसीर के लिए रावण का पुतला बनाना महज एक काम नहीं, पुरखों से मिली विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है। वह बताते हैं कि उनके बाबा और पिता भी रावण के पुतले बनाते थे। पिता को काम करते देखकर उन्होंने यह हुनर सीखा। अब वह इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। दशहरा नजदीक आते ही पुतला बनाने की तैयारी शुरू हो जाती है।
बांस के ढांचे से लेकर सजावट तक मेहनत
रावण का करीब 21 फीट ऊंचा पुतला तैयार करने में 12 से 15 दिन लगते हैं। इस पर लगभग 30 हजार रुपये खर्च होते हैं। सबसे पहले बांस से ढांचा तैयार किया जाता है। फिर रंगीन कागज, टाट, सुतली और विशेष लेई की मदद से उसे आकार दिया जाता है। इसके बाद सजावट और दहन के लिए आतिशबाजी की व्यवस्था होती है। नसीर के मुताबिक, पुतले के हर हिस्से को तैयार करने में सावधानी बरतनी पड़ती है। ढांचे की मजबूती से लेकर अंतिम सजावट तक उनका अनुभव काम आता है।
पीढ़ियों से कायम है भरोसे का रिश्ता
गौरीगंज के दशहरा मेले में रावण दहन देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। आयोजन को भव्य रूप देने में नसीर के परिवार की मेहनत भी शामिल रहती है। स्थानीय रामलीला समिति पुतला तैयार कराने के लिए उनके हुनर पर भरोसा करती है। परिवार की पीढ़ियों से चली आ रही भागीदारी इस परंपरा को खास बनाती है।
साझी विरासत की मिसाल है परंपरा
गौरीगंज निवासी ओपी सिंह बताते हैं कि वर्ष 1909 से चली आ रही दशहरा मेले की परंपरा में नसीर के परिवार का योगदान सामाजिक सौहार्द की मिसाल है। त्योहारों की यही खूबसूरती है कि लोग मिलकर अपनी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाते हैं। गौरीगंज की यह परंपरा बताती है कि लोक संस्कृति लोगों को जोड़ने और आपसी सद्भाव मजबूत करने का काम करती है।
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