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दस साल बाद भी खैर कटान की अनुमति नहीं, बिलासपुर के ग्रामीणों में रोष; सरकार से लगाई गुहार
श्री नयना देवी विधानसभा क्षेत्र में खैर के पेड़ों के कटान की अनुमति नहीं मिलने से ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। वन विभाग की सलोआ, बड़ोह और कोट बीट में वर्ष 2015-16 में खैर कटान हुआ था। ग्रामीणों का कहना है कि नियमानुसार करीब 10 साल बाद वर्ष 2025-26 में दोबारा कटान की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए थी, लेकिन अब तक इस संबंध में कोई आदेश जारी नहीं हुए हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि खैर के पेड़ उनके लिए केवल जंगल की संपदा नहीं, बल्कि आय का महत्वपूर्ण साधन हैं। भाखड़ा बांध के निर्माण के बाद क्षेत्र के कई परिवारों के लिए खैर एक प्रमुख नगदी फसल के रूप में विकसित हुआ है। इससे होने वाली आमदनी से परिवार बच्चों की पढ़ाई, शादी-ब्याह, मकान निर्माण और इलाज जैसी जरूरी जरूरतें पूरी करते हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार इस वर्ष भारी बारिश के कारण उनकी मलकीयत भूमि में खड़े कई खैर के पेड़ सूख रहे हैं और खराब हो रहे हैं। समय पर कटान की अनुमति नहीं मिलने से पेड़ों की उपयोगिता और उनकी आर्थिक कीमत प्रभावित होने की आशंका है।
ग्रामीणों का कहना है कि वे सरकारी वन भूमि पर खड़े पेड़ों को काटने की मांग नहीं कर रहे हैं। उनकी मांग केवल मलकीयत भूमि में खड़े खैर के पेड़ों के नियमानुसार कटान और बिक्री की अनुमति देने की है।
ग्रामीणों ने प्रदेश सरकार और वन विभाग से मामले को गंभीरता से लेते हुए सलोआ, बड़ोह और कोट बीट में खैर कटान से संबंधित प्रक्रिया जल्द शुरू करने की मांग की है।
लोगों का कहना है कि पात्र परिवारों को नियमों के तहत अनुमति मिलने से छोटे और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को राहत मिल सकती है। खैर से होने वाली आय से वे अपने परिवार की जरूरी आर्थिक जरूरतों को पूरा कर सकेंगे।
ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि लंबे समय से लंबित मामले में जल्द निर्णय लेकर पात्र लोगों को नियमानुसार खैर कटान की अनुमति प्रदान की जाए।
खैर हिमाचल के निचले और मध्य पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाने वाला महत्वपूर्ण पेड़ है। इससे मिलने वाली लकड़ी का व्यावसायिक उपयोग होता है और खैर से कत्था भी तैयार किया जाता है। बिलासपुर सहित प्रदेश के कई इलाकों में खैर स्थानीय लोगों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत रहा है।
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