छत्तीसगढ़ का रायगढ़ और कोरबा जिला कोयला उत्पादन के साथ-साथ बिजली उत्पादन के लिए पूरे प्रदेश में अपनी अलग पहचान बना चुका है, लेकिन गजब की बात है कि इन दोनों जिले के कुछ गांव ऐसे भी जहां आज तक बिजली पहुंची ही नहीं है। ऐसे गांवों तक बिजली पहुंचाने रायगढ़ जिले के सामाजिक वैज्ञानिक और निजी कॉलेज के प्रोफेसर डीएस मालिया ने एक अनोखी पहल की है। उन्होंने झरने के पानी से बिजली पैदा करने का मॉडल तैयार किया है, जिससे रायगढ़ और कोरबा जिले के कुछ गांव में बिजली पहुंचाने के बाद अब अन्य गांव में भी बिजली पहुंचाने की तैयारी चल रही है।
रायगढ़ और कोरबा जिले के अंतिम छोर के दूरस्थ पहाड़ी इलाकों में कई ऐसे गांव हैं, जहां बिजली पहुंची ही नहीं है। आज के डिजिटल युग में भी इन गांव के लोगों को रोशनी के लिए इंतजार करना पड़ रहा है। ऐसे ही गांवों तक बिजली पहुंचाने की कोशिश धरमजयगढ़ के सामाजिक वैज्ञानिक और निजी कॉलेज के प्रोफेसर डीएस मालिया ने की है। उन्होंने अपने साथियों और ग्रामीणों की मदद से रायगढ़ जिले के प्राकृतिक झरने के पानी से बिजली बनाने का मॉडल तैयार किया। पहला प्रयोग रायगढ़ जिले में हुआ जिसकी सफलता के बाद झरने से बनने वाली बिजली दूसरे प्रोजेक्ट में कोरबा जिले के मालिकछार गाँव तक पहुंचाया जा चुका है। लेकिन घरों में कनेक्शन के लिए संसाधनों की व्यवस्था जारी है। अभी घरों में कनेक्शन नहीं जोड़ा गया है।
प्रोफेसर डीएस मालिया ने बताया कि वर्ष 2023 में रायगढ़ जिला मुख्यालय से तकरीबन 120 किलोमीटर दूर घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरे धरमजयगढ़ ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले बोरला झरिया गांव से इस प्रयोग की शुरुआत की थी। शुरुआती प्रयास के बाद उन्होंने अपने सहयोगी आलोक शर्मा, प्रमोद चंदेल और गुलाब पटेल के साथ कोरबा जिले के मालिकछार गांव में भी माइक्रो हाइड्रो टरबाइन परियोजना शुरू की। यहां झरने के पानी से करीब 10 किलोवॉट क्षमता की बिजली उत्पादन व्यवस्था तैयार की गई। टरबाइन स्थल से लगभग 1800 मीटर दूर स्थित गांव तक भूमिगत केबल के जरिए बिजली पहुंचाया। कोरबा जिले के माली कछार गांव में टर्बाइन से पहली बार बिजली पहुंचने पर गांव के लोगों ने डी जे बजाकर खुशी मनाई गई। साथ ही प्रोफेसर डीएस मालिया और उनकी टीम का आभार भी जताया था।
साथियों और गांव ने लोगों ने किया सहयोग
उन्होंने बताया कि मालिकछार तक बिजली उत्पादन का सिस्टम पहुंचाना और उसे स्थापित करना आसान नहीं था। पहाड़ी क्षेत्र में सड़क और परिवहन की सीमित सुविधा के कारण पाइप, टरबाइन और अन्य उपकरण पहुंचाने में मुश्किलें आईं। ऐसे में साथियों और गांव के ग्रामीणों ने उनका साथ दिया। इस दौरान उन्होंने किसी भी सरकारी योजना या एनजीओ से फंडिंग नहीं लिया।
2024 में शुरू हुआ बिजली उत्पादन
प्रोफेसर डीएस मालिया ने बताया कि धरमजयगढ़ क्षेत्र के सलियारी झरने में 12 महीना पानी बहते रहता है। इसलिए उन्होंने टरबाइन परियोजना के लिए इसका चयन किया। झरने की ऊंचाई समुद्र तल से करीब 537 मीटर जबकि झरने की ऊंचाई 111 फीट है। यहां सालभर पानी उपलब्ध रहने की संभावना इस तरह की माइक्रो हाइड्रो परियोजना के लिए महत्वपूर्ण है। बहते पानी से टरबाइन चलती है और उससे जनरेटर के माध्यम से बिजली पैदा की जाती है। जून 2023 में काम शुरू किया गया था और 17 फरवरी 2024 से नियमित बिजली उत्पादन शुरू हुआ। टरबाइन से करीब 1800 मीटर दूर गांव तक भूमिगत केबल बिछाकर बिजली पहुंचाया गया।
कई और गांव में बिजली पहुंचाने की तैयारी
प्रोफेसर डीएस मालिया ने बताया कि मालिकछार गांव में करीब 57 घर हैं। इस योजना के तहत प्रत्येक घर में पांच बल्ब और पंखे व टेलीविजन के उपयोग के लिए कनेक्शन देने की बात कही गई है। गांव के स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्र को भी बिजली उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। इन सुविधाओं से बच्चों की पढ़ाई और ग्रामीणों के दैनिक जीवन में सहूलियत मिलने की उम्मीद है। हालांकि, सभी 57 घरों, स्कूल और आंगनबाड़ी में कनेक्शन चालू होने की बात कही जा रही है। वहीं आने वाले समय में गंवरडांड़, चांपकछार,छुहीपहाड़ और सिरडाही गांव में भी बिजली पहुंचाने की तैयारी की जा रही है।
प्रशासनिक अधिकारी कर चुके हैं अवलोकन
प्रोफेसर डीएस मालिया ने बताया कि उनका उद्देश्य उन दूरस्थ पहाड़ी गांवों में स्थानीय जल संसाधनों का उपयोग करना है, जहां बिजली ग्रीड पहुंचाना फिलहाल कठिन है। उन्होंने वन अधिकार कानून, 2006 के तहत सामुदायिक वन संसाधन अधिकार प्राप्त गांवों में उपलब्ध जल संसाधनों का उपयोग कर ऐसी परियोजनाएं विकसित करने की संभावनाओं पर काम करने की बात कही है। उनके इस काम की सराहना रायगढ़ व कोरबा जिले के कलेक्टर, डीएफओ समेत अन्य अधिकारियों को दी है। यहीं नहीं अधिकारियों ने उनके प्रोजेक्ट को जमीनस्तर पर भी जाकर देखा भी है।
गांव की समस्या देखकर बनाया ड्रीम प्रोजेक्ट
प्रोफेसर डीएस मालिया ने बताया कि यह मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट है 2003 में मैंने हमारे कालेज के छात्र छात्राओं का इस गांव में शिविर लगाया था तभी वहां के लोगों की समस्याओं को नजदीक से देख अनुभव किया कि कैसे आजादी के इतने वर्षों बाद भी बिना सड़क पानी और बिजली के लोग जीवन जी रहे हैं और तभी से ठान लिया कि कुछ करना है और फिर दिमाग में आया क्यों ना स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर बिजली उत्पादन किया जाए और फिर हमर गांव हमर बिजली कांसेप्ट बनाया और बस काम शुरू कर दिया गया।
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