{"_id":"6aa7a8f873930aeda50dbde4","slug":"the-siddhi-vinayak-ganesh-temple-is-a-center-of-faith-khargone-news-c-1-1-noi1457-4722141-2026-09-14","type":"video","status":"publish","title_hn":"गणेश चतुर्थी विशेष: साधु नहीं उठा सके थे गणेश प्रतिमा, कुंदा तट पर विराजे सिद्धि विनायक","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गणेश चतुर्थी विशेष: साधु नहीं उठा सके थे गणेश प्रतिमा, कुंदा तट पर विराजे सिद्धि विनायक
देशभर में गणेशोत्सव की शुरुआत हो गई है। खरगोन शहर के प्राचीन सिद्धिविनायक गणेश मंदिर में भी दस दिवसीय गणेशोत्सव को लेकर विशेष तैयारियां की गई हैं। करीब 500 साल पुराना बताया जाने वाला यह मंदिर भगवान गणेश की अनूठी प्रतिमा और उससे जुड़ी प्राचीन मान्यता के कारण श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है।
मंदिर के पुजारी पंडित प्रणय भट्ट के अनुसार करीब 500 वर्ष पहले शहर से कुछ दूरी पर स्थित ग्राम नवलपुरा में नागा साधुओं ने बड़ा यज्ञ किया था। यज्ञ समाप्त होने के बाद साधु भगवान सिद्धिविनायक की प्रतिमा लेकर वापस निकले। रास्ते में कुंदा नदी के तट पर उन्होंने रात्रि विश्राम किया। इस दौरान प्रतिमा को नदी किनारे रखा गया।
सुबह जब साधुओं ने प्रतिमा को उठाकर आगे ले जाने का प्रयास किया तो वह अपने स्थान से नहीं हिली। कई प्रयासों के बाद भी प्रतिमा नहीं उठी। इसके बाद साधु भगवान सिद्धिविनायक की प्रतिमा को वहीं छोड़कर आगे चले गए। इसी घटना से कुंदा तट पर भगवान के विराजित होने की मान्यता जुड़ी है। नवलपुरा में आज भी यज्ञ और प्रतिमा से जुड़े अवशेष होने की बात कही जाती है।
मंदिर में स्थापित प्रतिमा का स्वरूप भी खास है। एक पाषाण पर बनी प्रतिमा में भगवान के शीश पर चंद्रमा, माथे पर तीसरा नेत्र और सूंड पर नाग की आकृति दिखाई देती है। गले में 108 दानों की रुद्राक्ष माला है। भगवान चतुर्भुज रूप में विराजित हैं। एक हाथ में लड्डू और दूसरे हाथ में करमाला है। हाथ में शिवलिंग की अंगूठी भी दिखाई देती है। प्रतिमा का करीब पांच से छह फीट हिस्सा ही दिखाई देता है। मान्यता है कि जिस कमल पुष्प पर भगवान विराजमान हैं, उसका हिस्सा जमीन के अंदर है।
गणेशोत्सव के दौरान मंदिर में रोजाना काकड़ आरती और महाअभिषेक होगा। शाम 7.30 बजे से भजन और इसके बाद महाआरती की जाएगी। भगवान का विशेष पूजन और शृंगार होगा। मंदिर परिसर को फूलों और तोरण द्वार से आकर्षक रूप से सजाया गया है। गर्भगृह के बाहर चांदी के मूषक भी विराजित हैं। मंदिर में भगवान को पोषाक चढ़ाने की भी विशेष परंपरा है। मंदिर समिति के पास भगवान के लिए हजारों पोषाक मौजूद हैं। गणेशोत्सव के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के मंदिर पहुंचने की उम्मीद है।
एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम वीडियो सिर्फ सब्सक्राइबर्स के लिए उपलब्ध है
प्रीमियम वीडियो
सभी विशेष आलेख
फ्री इ-पेपर
सब्सक्राइब करें
Next Article
Disclaimer
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।