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बाघों के आतंक के साए में जी रहा जंगल से सटा इलाका
Updated Mon, 20 Nov 2017 10:58 PM IST
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लखीमपुर खीरी।
जिले में जंगल से सटे गांवों में रहने वाले लोग बाघ के आतंक के साए में जी रहे है। आए दिन लोग या तो बाघ का निवाला बन रहे हैं या बाघ के हमले का शिकार हो रहे हैं। दुधवा टाइगर रिजर्व के बफर जोन में शामिल मैलानी और भीरा रेंज के अलावा दक्षिण खीरी वन प्रभाग के महेशपुर रेंज में लगातार बाघों के हमले हो रहे हैं। पिछले 21 माह के अंदर 15 लोग बाघ का निवाला बन चुके हैं। वन विभाग बाघों के बढ़ते हमलों के बीच लाचार नजर आ रहा है।
वन विभाग का दावा है कि प्रोजेक्ट टाइगर के तहत बाघ संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों के चलते बाघों की आबादी में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है, जबकि वन क्षेत्र सीमित है। ऐसे में, बाघ जंगलों से निकलकर गन्ने के खेतों और नदी नाले के तटवर्ती हिस्सों को अपनी टेरीटरी में शामिल कर रहे हैं। जंगल से सटे इलाके में हो रहा गन्ना बाघों को बाहर प्राकृतिक आवास और अनुकूल वातावरण उपलब्ध करा रहा है।
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डीएफओ साउथ समीर वर्मा ने बताया कि महेशपुर रेंज के छोटे से जंगल में पांच बाघ मौजूद हैं। इस इलाके में पिछले छह माह के अंदर बाघ तीन लोगों को अपना निवाला बना चुके हैं। बाघों की लोकेशन जानने के लिए लगाए गए कैमरों में ट्रैप हुई तस्वीरों से यह स्पष्ट हुआ है कि तीन लोगों को अपना निवाला बनाने वाले बाघ अलग-अलग हैं। ऐसे में, किसी एक बाघ को तीन हत्याओं का गुनहगार नहीं ठहराया जा सकता।
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बाघ को अपराधी ठहराने की है यह प्रक्रिया
जब एक ही बाघ लगातार चार या चार से अधिक लोगों की जान ले ले और वन विभाग यह आश्वस्त हो ले कि यह बाघ इंसानों के जीवन के लिए खतरा बन चुका है तब संबंधित डीएफओ की रिपोर्ट पर प्रधान मुख्य वन संरक्षक परिस्थितियों की समीक्षा करने के बाद बाघ को ट्रैंकुलाइल करने या गोली मारने का आदेश जारी करते हैं। इसके लिए यह साबित करना जरूरी होता है कि एक ही बाघ लगातार घटनाएं कर रहा है। वन विभाग बाघ को गोली मारने की अपेक्षा उसे ट्रैंकुलाइज करने को प्राथमिकता देता है। ट्रैंकुलाइज कर गुनहगार बाघ को चिड़ियाघर ले जाया जाता है, वहीं उसका इलाज भी होता है।
बाघ पकड़ने को जिले में हैं यह संसाधन
बाघों को पकड़ने के लिए दक्षिण खीरी वन प्रभाग के पास महज दो पिंजड़े हैं। इनमें पड्डे आदि बांधकर बाघ को पकड़ने की कोशिश होती है। दुधवा नेशनल पार्क के पास ट्रैंकुलाइजर गन है जो अच्छी स्थिति में है। बाघों को ट्रैंकुलाइज करने की दवाएं भी उपलब्ध हैं। जरूरत पड़ने पर बाघों को ट्रैंकुलाइज करने के लिए नवाब वाजिद अली शाह चिड़ियाघर लखनऊ के ट्रैंकुलाइजर विशेषज्ञ डॉ. उत्कर्ष शुक्ला या डब्ल्यूटीआई के विशेषज्ञों की मदद ली जाती है। दुधवा नेशनल पार्क के उपनिदेशक महावीर कौजलगि का कहना है कि बाघों को ट्रैंकुलाइज करने के सभी अपडेटेड संसाधन पार्क प्रशासन के पास हैं।
बाघ को ट्रैंकुलाइज करने की अनुमति मिलने की लंबी प्रक्रिया है। महेशपुर में तीन लोगों को मारने वाले अलग-अलग बाघ हैं। ऐसी दशा में किसी बाघ को ट्रैंकुलाइज करने की सिफारिश करने का अभी कोई औचित्य नहीं हैं।
समीर वर्मा, डीएफओ साउथ खीरी।
दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन के पास बाघों को ट्रैंकुलाइज करने के सभी संसाधन, अपडेटेड ट्रैंकुलाइजर गन, बेहोशी की दवाएं उपलब्ध हैं। जरूरत पड़ने पर ट्रैंकुलाइजर एक्सपर्ट की मदद ली जाती है। दुधवा टाइगर रिजर्व के अलावा जरूरत के मुताबिक संबंधित वनाधिकारियों की मांग पर यह संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं।
महावीर कौजलगि
उपनिदेशक, दुधवा नेशनल पार्क, लखीमपुर खीरी