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विपरीत परिस्थितियों में फंसे मेधावियों को परीक्षा से वंचित करना ठीक नहीं : हाईकोर्ट

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 16 May 2026 02:31 AM IST
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It is not right to deprive meritorious students trapped in adverse circumstances from the examination: High Court
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि विपरीत परिस्थितियों में फंसे किसी मेधावी छात्र को केवल नियमों की जटिलताओं के कारण परीक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता। मानवीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए नियमों में आवश्यक संशोधन पर विचार किया जाना चाहिए।
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इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने डीएलएड छात्रा करिश्मा की याचिका निस्तारित कर दी। कोर्ट ने नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (एनसीटीई) को निर्देश दिया कि वह ऐसे छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए सहानुभूतिपूर्वक विचार करे। आवश्यकता पर कड़े नियमों में संशोधन पर भी मंथन करे।
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करिश्मा डीएलएड 2021 बैच की छात्रा हैं। पाठ्यक्रम का सत्र दो वर्ष विलंबित हो गया था। इसी बीच वर्ष 2022 की परीक्षा के दौरान उनके पिता का निधन हो गया, जिसके कारण वह गणित की परीक्षा नहीं दे सकीं। उन्होंने कोर्ट से गुहार की थी कि 2026 की परीक्षा में शामिल होने का अंतिम अवसर दिया जाए।
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राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन रेगुलेशन 2014 के अनुसार दो वर्षीय डीएलएड पाठ्यक्रम अधिकतम तीन वर्ष में पूरा किया जाना अनिवार्य है। साक्षी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले का हवाला देते हुए कहा कि नियमों में ढील देने का अधिकार राज्य सरकार अथवा विभागीय सचिव के पास नहीं है।
हालांकि, अदालत ने माना कि छात्रा के मामले में देरी उसकी व्यक्तिगत लापरवाही के कारण नहीं, बल्कि पिता के निधन और शैक्षणिक सत्र में देरी जैसी असाधारण परिस्थितियों के कारण हुई। कोर्ट ने यह भी कहा कि एनसीटीई रेगुलेशन 2014 में ऐसी मानवीय आकस्मिक परिस्थितियों को लेकर कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जिससे छात्रों को कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।

कोर्ट ने एनसीटीई को सुझाव दिया कि वास्तविक कारणों से परीक्षा से वंचित रहने वाले छात्रों को न्यूनतम योग्यता प्राप्त करने का निष्पक्ष अवसर देने के लिए आवश्यक हो तो नियमों में संशोधन पर भी विचार किया जाए।
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