एक्सप्लेनर: ईपीएफओ की अनिवार्य वेतन सीमा बढ़ने से आपकी बचत पर क्या होगा असर, नियोक्ता पर कितना भार, समझें गणित
केंद्र सरकार ने संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए बड़ा कदम उठाते हुए कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के तहत अनिवार्य कवरेज के लिए मासिक वेज सीलिंग (वेतन सीमा) को ₹15,000 से बढ़ाकर ₹25,000 प्रति माह करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इससे ईपीएफओ कैलकुलेशन का गणित कितना बदलेगा, आइए समझते हैं विस्तार से।
विस्तार
देश के संगठित क्षेत्र में काम करने वाले लाखों कर्मचारियों के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा और राहत भरा कदम उठाया है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को श्रम व रोजगार मंत्रालय के उस प्रस्ताव को औपचारिक मंजूरी दे दी है, जिसके तहत कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के तहत अनिवार्य कवरेज के लिए मासिक वेज सीलिंग (वेतन सीमा) को ₹15,000 से बढ़ाकर ₹25,000 प्रति माह कर दिया गया है।
सरकार के इस फैसले से 51 लाख से अधिक अतिरिक्त कर्मचारी सीधे तौर पर ईपीएफओ के दायरे में आ जाएंगे और उनके सामाजिक सुरक्षा कवच का विस्तार होगा। कर्मचारियों और नियोक्ताओं पर इस इस फैसले का असर कैसे पड़ेगा। आइए समझते हैं विस्तार से।
कर्मचारियों पर क्या असर पड़ेगा?
मौजूदा व्यवस्था के तहत, यदि कोई कर्मचारी रुपये 15,000 प्रति माह से अधिक के शुरुआती वेतन पर नौकरी शुरू करता था, तो वह स्वचालित रूप से ईपीएफ ढांचे के तहत अनिवार्य रूप से शामिल नहीं होता था। इसके कारण ऐसे कर्मचारी अनिवार्य भविष्य निधि (पीएफ), पेंशन और संबंधित बीमा सुरक्षा से बाहर रह जाते थे। अब इस सीमा को बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह किए जाने से 15,000 रुपये से 25,000 रुपये के बीच वेतन अर्जित करने वाले कर्मचारियों का एक बड़ा वर्ग वैधानिक सामाजिक सुरक्षा प्रणाली के दायरे में आ जाएगा। हालांकि, सरकार के इस फैसले से कर्मचारियों की इन हैंड सैलरी में थोड़ी कमी जरूर हो जाएगी। आइए इसका गणित हम आगे समझेंगे।
पहले समझते हैं कर्मचारियों के लिए अनिवार्य सीमा बढ़ने का फायदा क्या?
इसका सीधा जवाब है- बचत। सीलिंग बढ़ने से भविष्य निधि में कर्मचारी का अंशदान बढ़ेगा। इससे कर्मचारी की दीर्घकालिक बचत बढ़ेगी। आइए इसके पीछे का गणित समझते हैं।
पहले
मान लीजिए पहले कर्मचारी की सैलरी 15000 रुपये प्रति महीने थी। ऐसे में
ईपीएफ मद में कर्मचारी का भार (12%) = ₹1800
ईपीएफ मद में नियोक्ता का भार (3.67%) = ₹550
ईपीएस (पेंशन) मद में नियोक्ता पर भार (8.33%) = ₹1250
स्कीम के तहत कर्मचारी का कुल लाभ = ₹3600
अब
अनिवार्य वेतन सीमा 25000 रुपये होने से क्या बदलेगा?
ईपीएफ मद में कर्मचारी का भार (12%) = ₹3000
ईपीएफ मद में नियोक्ता का भार (3.67%) = ₹917
ईपीएस (पेंशन) मद में नियोक्ता पर भार (8.33%) = ₹2083
स्कीम के तहत कर्मचारी का कुल लाभ = ₹6000
ऐसे में सरकार के नए फैसले से कर्मचारियों को पीएफ स्कीम के तहत 6000-3600= 2400 रुपये का अतिरिक्त लाभ मिलेगा।
कर्मचारियों के लिए क्या कोई नुकसान है?
नहीं, सिवाय इसके कि हर महीने हाथ में आने वाली तनख्वाह यानी इन-हैंड सैलरी में कुछ अधिक कटौती हो जाएगी। इसे इस उदाहरण से समझिए:
सरकार के फैसले के बाद कर्मचारी के पीएफ व पेंशन खाते में करीब 2400 रुपये अधिक जमा होंगे। इसमें से 1200 रुपये का भार कर्मचारी को खुद उठाना होगा यानी उसे 1200 रुपये और अधिक अपने इन हैंड वेतन से कटवाने होंगे। इसके अलावे, अतिरिक्त 1200 रुपये का भार नियोक्ता को उठाना पड़ेगा।
नियोक्ताओं पर कितना भार बढेगा?
सरकार के नए निर्णय से नियोक्ताओं पर देनदारी का भार बढ़ेगा जैसा कि ऊपर के गणित में स्पष्ट है। पहले 15000 रुपये की सैलरी की स्थिति में नियोक्ता को कर्मचारी के मद में ईपीएफओ स्कीम के तहत पीएफ और पेंशन खाते में 1800 रुपये जमा करने होते थे। अब उन्हें भी कर्मचारी की तरह 1200 रुपये अधिक चुकाने होंगे। इसके अलावे नियोक्ताओं व कर्मचारियों को ईडीएलआई (इम्प्लाई डिपॉजिट लिंक्ड इंश्योरेंस) के तहत सुरक्षा के लिए प्रशासनिक शुल्क के रूप में 0.5% का अतिरिक्त भुगतान भी करना होगा। जैसे सैलरी अब अगर 10000 रुपये बढ़ी है तो ऐसे में प्रशासनिक शुल्क के मद में 10000 का .05 प्रतिशत यानी करीब 100 रुपये का भार भी नियोक्ताओं व कर्मियों को उठाना पड़ेगा।
प्रशासनिक शुल्क के साथ नियोक्ता और कर्मियों पर अतिरिक्त भार कितना?
| नियोक्ता पर अतिरिक्त भार | राशि |
|---|---|
| EPF + EPS में अतिरिक्त योगदान | ₹1,200 |
| ₹10,000 अतिरिक्त वेतन पर 0.5% प्रशासनिक शुल्क | ₹50 |
| कुल अतिरिक्त मासिक भार | ₹1,250 |
| कुल अतिरिक्त सालाना भार | ₹15,000 |