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गंगाघाट पर न अस्थायी चेंजरूम न टॉयलेट
अमर उजाला ब्यूरो,बदायूं
Updated Mon, 18 Sep 2017 06:10 PM IST
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Kachla ghat
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अविरल-निर्मल गंगा और राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन। ये स्लोगन हैं दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की सत्ता पर काबिज नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भारत सरकार के। गंगा को स्वच्छ बनाए रखने के लिए नमामि गंगे योजना से लेकर कई ऐसी कार्ययोजनाओं को भी हकीकत में उतारने की कोशिश के बीच यहां कछला में जीवनदायिनी के तट की हालात पर गौर करें तो शर्मसार होना पड़ेगा। घाट पर स्नानार्थी महिलाओं के लिए कपड़े बदलने को न तो अस्थायी चेंजरूम हैं और न ही टॉयलेट। कपड़े बदलने के लिए महिलाओं को साड़ियों की ओट लेनी पड़ती है।
कछला गंगाघाट की जमीनी हकीकत से अफसरों को छोड़िए, राजनेता और स्वयंसेवी संस्थाओं के वे लोग भी रूबरू नहीं होते जो घाट की सफाई से लेकर श्रद्धालुओं को सुविधा मुहैया कराने के लंबे-चौडे़ दावे करते रहते हैं। करीब एक किलोमीटर के दायरे में आने वाले गंगाघाट पर यूं तो बदायूं और कासगंज ही नहीं बल्कि आसपास के जिलों के श्रद्धालुओं के साथ गंगा को सर्वोपरि मानने वाले राजस्थान के लोग भी आते-जाते रहते हैं लेकिन इन लोगों को बेपर्दगी से बचाने की जहमत उठाने की कोशिश नहीं की जाती। पूर्णिमा और विशेष स्नान पर्वों पर लाखों की संख्या में जुटने वाले श्रद्धालुओं में खासकर महिलाओं को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। यहां तक कि उन्हें साड़ियों की ओट लेकर वस्त्र बदलने पड़ते हैं। शर्मसार तो घाट पर प्रसाद बेचने वाले दुकानदार भी होते हैं लेकिन श्रद्धालुओं के लिए इंतजाम नहीं कर पाते। वैसे, श्रद्धालुओं के लिए बेहतर सुविधा और संसाधन मुहैया कराने की जिम्मेदारी नगर पंचायत प्रशासन और राजस्व महकमे की है। नगर पंचायत प्रशासन ने एक-दो स्थानों पर अस्थायी चेंजरूम बनाए हैं, काफी दूर होने की वजह से महिलाएं उन तक पहुंच नहीं पातीं।
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कछला गंगाघाट की जमीनी हकीकत से अफसरों को छोड़िए, राजनेता और स्वयंसेवी संस्थाओं के वे लोग भी रूबरू नहीं होते जो घाट की सफाई से लेकर श्रद्धालुओं को सुविधा मुहैया कराने के लंबे-चौडे़ दावे करते रहते हैं। करीब एक किलोमीटर के दायरे में आने वाले गंगाघाट पर यूं तो बदायूं और कासगंज ही नहीं बल्कि आसपास के जिलों के श्रद्धालुओं के साथ गंगा को सर्वोपरि मानने वाले राजस्थान के लोग भी आते-जाते रहते हैं लेकिन इन लोगों को बेपर्दगी से बचाने की जहमत उठाने की कोशिश नहीं की जाती। पूर्णिमा और विशेष स्नान पर्वों पर लाखों की संख्या में जुटने वाले श्रद्धालुओं में खासकर महिलाओं को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। यहां तक कि उन्हें साड़ियों की ओट लेकर वस्त्र बदलने पड़ते हैं। शर्मसार तो घाट पर प्रसाद बेचने वाले दुकानदार भी होते हैं लेकिन श्रद्धालुओं के लिए इंतजाम नहीं कर पाते। वैसे, श्रद्धालुओं के लिए बेहतर सुविधा और संसाधन मुहैया कराने की जिम्मेदारी नगर पंचायत प्रशासन और राजस्व महकमे की है। नगर पंचायत प्रशासन ने एक-दो स्थानों पर अस्थायी चेंजरूम बनाए हैं, काफी दूर होने की वजह से महिलाएं उन तक पहुंच नहीं पातीं।
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