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बेपटरी हुई जिंदगी... जेब में पैसे नहीं, आंखों में सिर्फ आंसू, मजदूरों ने बयां की अपने दर्द की कहानी

Sat, 16 May 2020 05:02 PM IST
कपिल kapil न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बागपत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बागपत Published by: कपिल kapil Updated Sat, 16 May 2020 05:02 PM IST
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Baghpat, Uttar Pradesh Lockdown Latest News Update, Many workers are going their homes by way of Baghpat Shamli and Saharanpur
अपने घर पैदल जाते मजदूर - फोटो : अमर उजाला

बेपटरी हुई जिंदगी खुद से ही सवाल पूछते हुए मंजिल ढूंढ रही है। गर्मी, धूप और बरसात में सफर ना जाने कब पूरा होगा। खता कुछ भी नहीं है, बस सजा मिली है। जिन फैक्टरियों की रीढ़ थे, अब उन्हीं के मालिकों ने पांच किलो आटा और एक लीटर सरसों का तेल देकर कह दिया कि जिंदगी गुजार लो। ऐसे भी कहीं जिंदगी चलती है।

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पैदल चलते चलते थक गए मजदूर - फोटो : अमर उजाला

सहारनपुर, बागपत और शामली जनपदों मं पहुंचे हजारों श्रमिकों की कुछ ऐसी ही व्यथा है। आंखों में कुछ है तो वे हैं आंसू, रोजगार छीनने का गम और बस घर पहुंचने की जल्दी।

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आराम करते मजदूर - फोटो : अमर उजाला

बस! अब घर ही जाना है
हरियाणा के सोनीपत से बागपत पहुंचे शाहजहांपुर, सुल्तानपुर और पूर्वी जिलों के प्रवासियों के सीने में दर्द भरा है। बेबसी और बच्चों की भूख ने ऐसी चोट दी कि सड़कों पर निकल पड़े।

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श्रमिक - फोटो : अमर उजाला

शाहजहांपुर के नागेश बताते हैं कि वह सोनीपत की धागा फैक्टरी में काम करता था, होली मनाकर 21 मार्च को ड्यूटी पर लौटा था। एक दिन की ड्यूटी ही कर पाया कि लॉकडाउन लग गया। जब तक जेब में रुपये रहे, जिंदगी चलती रही। नगदी खत्म हुई तो फैक्टरी मालिक के पास पहुंचे। परिवार के सात लोगों के लिए मालिक ने पांच किलो आटा और एक लीटर तेल दिया। राशन खत्म हो चुका था, बच्चे भूख से बिलख रहे थे, तो उन्होंने किसानों के गेहूं काटे। घर न होने पर सड़क पर खाना बनाकर किसी तरह रातें गुजारी, अब बहुत हुआ, वह अपने गांव अपने घर जाना चाहते हैं।

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रामदयाल और ममता - फोटो : अमर उजाला

सुल्तानपुर के लिए निकली ममता कहती हैं कि उसके दो बेटे व एक बेटी हैं। नौकरी छूटने के बाद खाने के लाले पड़ गए। पैदल चलकर वह बागपत पहुंचे हैं। अब वह कभी लौटकर नहीं आएगी।

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