बेपटरी हुई जिंदगी खुद से ही सवाल पूछते हुए मंजिल ढूंढ रही है। गर्मी, धूप और बरसात में सफर ना जाने कब पूरा होगा। खता कुछ भी नहीं है, बस सजा मिली है। जिन फैक्टरियों की रीढ़ थे, अब उन्हीं के मालिकों ने पांच किलो आटा और एक लीटर सरसों का तेल देकर कह दिया कि जिंदगी गुजार लो। ऐसे भी कहीं जिंदगी चलती है।
बेपटरी हुई जिंदगी... जेब में पैसे नहीं, आंखों में सिर्फ आंसू, मजदूरों ने बयां की अपने दर्द की कहानी
सहारनपुर, बागपत और शामली जनपदों मं पहुंचे हजारों श्रमिकों की कुछ ऐसी ही व्यथा है। आंखों में कुछ है तो वे हैं आंसू, रोजगार छीनने का गम और बस घर पहुंचने की जल्दी।
बस! अब घर ही जाना है
हरियाणा के सोनीपत से बागपत पहुंचे शाहजहांपुर, सुल्तानपुर और पूर्वी जिलों के प्रवासियों के सीने में दर्द भरा है। बेबसी और बच्चों की भूख ने ऐसी चोट दी कि सड़कों पर निकल पड़े।
शाहजहांपुर के नागेश बताते हैं कि वह सोनीपत की धागा फैक्टरी में काम करता था, होली मनाकर 21 मार्च को ड्यूटी पर लौटा था। एक दिन की ड्यूटी ही कर पाया कि लॉकडाउन लग गया। जब तक जेब में रुपये रहे, जिंदगी चलती रही। नगदी खत्म हुई तो फैक्टरी मालिक के पास पहुंचे। परिवार के सात लोगों के लिए मालिक ने पांच किलो आटा और एक लीटर तेल दिया। राशन खत्म हो चुका था, बच्चे भूख से बिलख रहे थे, तो उन्होंने किसानों के गेहूं काटे। घर न होने पर सड़क पर खाना बनाकर किसी तरह रातें गुजारी, अब बहुत हुआ, वह अपने गांव अपने घर जाना चाहते हैं।
सुल्तानपुर के लिए निकली ममता कहती हैं कि उसके दो बेटे व एक बेटी हैं। नौकरी छूटने के बाद खाने के लाले पड़ गए। पैदल चलकर वह बागपत पहुंचे हैं। अब वह कभी लौटकर नहीं आएगी।
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