लॉकडाउन में काम बंद हुआ तो प्रवासी श्रमिकों की जमा पूंजी भी ज्यादा दिन नहीं चली। कुछ दिन परिचितों ने मदद की, लेकिन फिर हाथ खींच लिए। मकान मालिक किराया मांगने लगा तो गांव लौटने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचा। सामान बांधा और पैदल ही सैकड़ों मील दूर अपने गांव के निकल गए। गर्मी की वजह से रात भर चलते थे। पैरों में सूजन भी आ गई। पेश है प्रवासी श्रमिकों से बातचीत की ये खास रिपोर्ट-
बेबसी: आंखों में नींद, पैरों में छाले... दर्द के सिवा कुछ नहीं, बच्चों के साथ जारी है मजदूरों का सफर
रोशनी के पैर में पडे़ छाले
उन्नाव के बांगर गांव निवासी हरिशचंद्र का परिवार पंचकुला में बेलदारी करता था। लॉकडाउन के बाद काम छिना तो रोटी के लाले पड़ गए। चार दिन पहले पैदल ही पूरा परिवार निकल गया।
रास्ते में पत्नी रोशनी की चप्पल टूट गई। हरिशचंद्र और रोशनी ने एक दूसरे की चप्पल बदलकर पहनीं। रोशनी के पैरों में छाले पड़ गए और सूजन आ गई। मगर उम्मीदों का सफर जारी है।
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बस अड्डे पर पहुंचते ही सो गए मां-बेटे
मुरादाबाद के चंदौसी निवासी रजनी पत्नी किरणपाल अपनी बेटी रोशनी, आसमी, दिलखुश और बेटे गोलू के साथ पैदल चलकर रोडवेज बस स्टैंड पहुंची। परिवार इतना थका था कि वहां पहुंचते बेटा सो गया। मां ने दुपट्टे के पल्लू से हवा झलनी शुरू कर दी, सफर की थकावट से उसकी भी आंख लग गईं। बेटियों ने बताया कि मोहाली में पूरा परिवार मजदूरी करता था।
मंदिर-गुरुद्वारों के सहारे भरा पेट
मुरादाबाद के पालमपुर निवासी सुरेश का परिवार मोहाली में फैक्टरी में काम करता था। काम बंद हुआ। कुछ दिन जमा पूंजी से काम चला। चार दिन सामान उठाकर पैदल ही घर के लिए निकल गए। रास्ते में गुरुद्वारों में लंगर चखा, मंदिरों में भंडारे में पेट भरा। बांगर निवासी हरिशचंद्र बस के बारे में जानकारी करने गया। तो बेटा राजा अपनी मां रोशनी से पूछता रहा कि मम्मी बस कब आएगी। मां दिलासा देती रही, बेटा तेरे पापा पता करने गए हैं।
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