अलर्ट: 32 हफ्ते में ही जन्म ले बच्चा तो करवा लें आखों की जांच, रेटिनाेपैथी का रहता है खतरा
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में एक साल में समय से पूर्व जन्मे 600 बच्चों की जांच में हुई है। नेत्र रोग विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. रामकुमार जायसवाल ने बताया कि तीन से चार फीसदी बच्चे ऐसे मिले, जिन्हें गंभीर दिक्कतें थी। जो बच्चे समय से पहले जन्म ले रहे हैं और उनका वजन दो किलो से कम है।
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अगर 32 हफ्ते में ही बच्चा जन्म ले तो उसके आंखों की जांच जरूर करा लें। समय से पूर्व जन्म लेने वाले बच्चों की आंखों की रोशनी पर खतरा है। ऐसे बच्चों की आंखों में रेटिनोपैथी जैसी गंभीर बीमारी का खतरा है। इस बीमारी में आंखों में जाने वाली खून की कोशिकाएं गर्भावस्था के दौरान धीरे-धीरे विकसित होती हैं, जिसकी वजह से उनके आंखों के परदों पर कई परतें जमा हो जाती हैं और बच्चों को कम दिखाई देने लगता है। समय से जांच होने से इस बीमारी का इलाज है, लेकिन अगर इलाज में देरी होती है तो स्थिति ज्यादा बिगड़ जाती है।
इस बात की जानकारी बीआरडी मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में एक साल में समय से पूर्व जन्मे 600 बच्चों की जांच में हुई है। नेत्र रोग विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. रामकुमार जायसवाल ने बताया कि तीन से चार फीसदी बच्चे ऐसे मिले, जिन्हें गंभीर दिक्कतें थी। जो बच्चे समय से पहले जन्म ले रहे हैं और उनका वजन दो किलो से कम है।
आईसीयू में ऑक्सीजन के सपोर्ट पर हैं या फिर 32 सप्ताह से पहले उनका जन्म हो जा रहा हैं तो ऐसे अभिभावक अपने बच्चों के आंखों की जांच जरूर कराएं। क्योंकि, समय से पूर्व जन्मे 15 से 18 फीसदी बच्चों में रेटिनोपैथी की गंभीर बीमारी मिली है।
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ऐसे की गई जांच
32 सप्ताह से पहले जन्मे बच्चों का प्रसव समय से पहले माना जाता है। इस दौरान उनके वजन की जांच की गई और यह भी पता किया गया कि उन्हें आईसीयू में ऑक्सीजन पर कितने दिनों तक रहना पड़ा। उस आधार पर आंखों की जांच की गई तो पता चला कि उनकी आंखों में जाने वाली खून की कोशिकाएं थी ही नहीं, जिसकी वजह से उनके आंखों के परदों पर कई परतें जमा हो गई थी, जिसकी वजह से उन्हें भविष्य में कभी दिखता नहीं।
बताया कि ये कोशिकाएं गर्भ में ही धीरे-धीरे विकसित होती है, लेकिन समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों में इन कोशिकाओं का विकास नहीं हो पाया। यही कारण है कि समय से पूर्व जन्म लेने वाले बच्चों के आंखों की जांच कराने की सलाह अभिभावकों को दी जाती है।
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तीन श्रेणी में रखा गया है इन मरीजों को
डॉ. रामकुमार ने बताया कि इन मरीजों को तीन श्रेणियों में रखा गया। पहले श्रेणी में अति गंभीर, दूसरी श्रेणी में गंभीर और तीसरी श्रेणी में हल्के लक्षण वाले मरीज शामिल किए गए थे। इनमें सबसे अधिक मरीज अति गंभीर वाले मिले। इसकी वजह यह थी कि इनका जन्म 32 सप्ताह से पहले हो गया, जिसकी वजह से इन मरीजों को लंबा ऑक्सीजन सपोर्ट पर रहने पड़ा।
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इंजेक्शन और सर्जरी से किया जा रहा इलाज
समय से जांच होने से इस बीमारी का इलाज है, लेकिन अगर इलाज में देरी होती है तो स्थिति ज्यादा बिगड़ जाती है। कई बार अभिभावक इस बीमारी को समझ नहीं पाते हैं और जब बच्चा थोड़ा बड़ा होता है या फिर चलने-फिरने की कोशिश करता है तो उन्हें पता चलता है कि बच्चे को दिख नहीं रहा है।
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इसके बाद सर्जरी ही विकल्प है, जो काफी कठिन है। अगर समय रहते पता चल जाए तो इंजेक्शन लगाने से ही इलाज हो जाता है। ये धमनियां धीरे-धीरे विकसित होती हैं। समय पूर्व प्रसव से इनका पूरी तरह से विकास नहीं हो पाता है।
इंजेक्शन व सर्जरी से इलाज संभव
जन्म के तुरंत बाद समस्या पता चल जाए तो इलाज संभव है। समस्या कम गंभीर होने पर इंजेक्शन से काम चल जाता है। अगर रेटिना ज्यादा क्षतिग्रस्त है तो सर्जरी की जरूरत पड़ती है। यदि इस पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो आंखों की रोशनी जाने का भी खतरा है।