गोरखपुर: 1998 की बाढ़ से भी नहीं चेते, हर 50 कदम पर बांध में गड्ढे और चूहों के बिल
संत प्रसाद ने कहा कि वर्ष 1998 में झरवा गांव के पास बांध कटने से बाढ़ आई थी। इससे पूरा इलाका डूब गया था। तबाही का मंजर हम लोगों ने देखा है। वर्ष 1974 में बंधा बहुत नीचे था और बाढ़ का पानी ओवरफ्लो होने लगा था। इसके बाद इसे ऊंचा किया गया था।
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भीषण बाढ़ ने शहर के दक्षिणी छोर पर राप्ती नदी के किनारे बना मलौनी बंधा वर्ष 1998 में तोड़ डाला था। बाढ़ के पानी में सारा इलाका डूब गया गया था। लेकिन, जिम्मेदारों ने सबक नहीं लिया। मानसून सिर पर है, लेकिन अभी स्थिति यह है कि हर 50 कदम पर गड्ढे और चूहों के बिल ने इस बंधे को खोखला कर दिया है।
यह स्थिति तब है, जब इस बंधे में लहसड़ी से लेकर अजवनियां तक हर साल रिसाव होता है। बावजूद, इसके बंधे की मरम्मत को लेकर लापरवाही बरती जा रही है। अब ऐसे में अगर राप्ती नदी उफनाई तो आसपास के 25 गांवों और शहर के लोगों की सांसें तो टंगी रहेंगी।
राप्ती नदी के बाएं तट पर 30 किमी लंबाई में मलौनी बंधा बना है। यह महेवा चुंगी से शुरू होकर कुईं बाजार तक बाढ़ के पानी से सुरक्षा करता है। हर साल मानसून सीजन में बाढ़ का पानी, बंधे तक पहुंच जाता है और लोगों की रातें नदी की लहरें देखते कटती हैं। बंधे पर लहसड़ी गांव के पास बोल्डर पिंचिंग का कार्य चल रहा है। लेकिन, गांव से थोड़ा सा आगे बढ़ने पर हर 50 कदम की दूरी पर छोटे-बड़े गड्ढे मिले।
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गांव वालों का कहना है कि पिछले साल के ही ये रेनकट हैं, जिन्हें भरा ही नहीं गया। बंधे पर डांगीपार ढाला की ओर बढ़ने पर बढ़ई टोला, डिहुआ गांव, लालपुर टीकर, बीस बिगहा गांव है। बंधे पर करीब 70 बड़े-बड़े गड्ढे नजर आए। बंधे के दोनों तरफ रेनकट और झाड़ियों के बीच छिपे रैटहोल नजर आए। बीस बिगहा गांव के पास ही सोनमती, सुनीता, ऊषा, सविता और सोनी बैठी थीं। उनसे बांध की हालत और मरम्मत के बारे में पूछा गया तो गुस्सा हो गईं। कहा-हमसे क्या पूछते हैं, आप खुद देख लीजिए। जगह-जगह गड्ढे नजर आ जाएंगे।
पीपल के पेड़ की जड़ से बह गई मिट्टी
खैरा गांव के पास पीपल का एक बड़ा पेड़ है। यहां के लोग बताते हैं कि पेड़ की जड़ें कटान रोकती हैं। लेकिन, अब इसकी जड़ से मिट्टी बह गई है। देखिए, इस साल क्या होता है। हम लोग तो हर साल बाढ़ से जूझने के लिए तैयार रहते हैं।
ये गांव हैं बंधे के किनारे
सेंदुली बेंदुली, लहसड़ी, डुहिया, विशुनपुरा, लालपुर टीकर, भसवा, नदुआ, बीस बिगहा, चिरइहवा, हथिया परास, नौवा डुमरी, कजाकपुर कालोनी, सेंदुली बेंदुली, गायघाट, बरबसपुर।
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वर्ष 1998 में झरवा गांव के पास कटा था बंधा
खैरा गांव के सामने बंधे के किनारे बेंच पर बैठे संत प्रसाद और सुभाष आपस में बातचीत कर रहे थे। उनसे जब बाढ़ के बारे में बात की गई तो दर्द उभर पड़ा। संत प्रसाद ने कहा कि वर्ष 1998 में झरवा गांव के पास बांध कटने से बाढ़ आई थी। इससे पूरा इलाका डूब गया था। तबाही का मंजर हम लोगों ने देखा है।
संत प्रसाद ने कहा कि वर्ष 1974 में बंधा बहुत नीचे था और बाढ़ का पानी ओवरफ्लो होने लगा था। बंधे को देखने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवंती नंदन बहुगुणा आए थे। उसके बाद बंधे को ऊंचा किया गया।
गढ्ढों में गिरकर चोटिल हो जाते हैं बाइक सवार
लहसड़ी गांव के सामने बंधे पर सात-आठ दुकानें हैं। एसबीआई ग्राहक सेवा केंद्र के पास नवीन, प्रियांशु, स्वराज यादव और सुशील निषाद बाइक खड़ी कर बैठे मिले। उन्होंने सड़क पर बड़े गड्ढे दिखाते हुए कहा कि पानी बरसने पर यहां दुर्घटना जरूर होंगी। वैसे, रोजाना कोई न कोई बाइक सवार, गड्ढे में गिरकर घायल होता है।
बोले ग्रामीण
खैरा गांव निवासी संत प्रसाद ने कहा कि मलौनी बंधा काफी संवेदनशील है। इसकी मरम्मत जरूरी है। लेकिन, अभी तक मिट्टी का एक ढेला भी नहीं रखा गया। बाढ़ आने पर सबकी नींद उड़ जाती है।
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खैरा गांव निवासी सुभाष ने कहा कि बंधे पर पिच रोड बनाई गई है, तबसे यह थोड़ा सुरक्षित हो गया है। लेकिन, रेनकट और चूहों के बिल बंद नहीं किए गए तो मुसीबत आएगी। बांध की सुरक्षा तो रामभरोसे ही है।
लहसड़ी निवासी नवीन ने कहा कि बंधे पर 10 किमी चले जाइए, हर 50 कदम पर दो-चार गड्ढे मिल जाएंगे। बरसात में इनकी हालत और खराब हो जाएगी। ऐसी हालत रही तो बंधे काफी कमजोर हो जाएंगे।
गायघाट निवासी प्रियांशु ने कहा कि बाढ़ आने पर कटान का खतरा बढ़ जाता है। रेनकट से पानी रिस कर बांध के बीच में पहुंचता है। अगर इसे ठीक नहीं कराया गया तो बाढ़ का दबाव रोक पाना मुश्किल होगा।
जिम्मेदारों ने क्या कहा
पीडब्ल्यूडी निर्माण खंड-तीन अधिशासी अभियंता अरविंद कुमार सिंह ने कहा कि बंधे पर बनी सड़क और पटरी टूटी है तो गांव वालों को शिकायत करनी चाहिए। सूचना रहती तो मरम्मत करा देते। मौके पर अवर अभियंता को भेजकर रेनकट और गड्ढों की जानकारी जुटाएंगे और उसे ठीक करा देंगे।