केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ग्वालियर पहुंचकर गोरखी स्थित देवघर में बाबा मंसूर अली शाह के सालाना उर्स में पारंपरिक तरीके से पूजा-अर्चना की। सिंधिया परिवार के मुखिया के रूप में बाबा की आराधना करने की यह परंपरा करीब 300 साल पुरानी बताई जाती है। खास बात यह है कि यहां बाबा की पूजा हिंदू और मुस्लिम, दोनों पद्धतियों के अनुरूप की जाती है।
देवघर में सिंधिया के पहुंचने के बाद बाबा मंसूर अली शाह के सम्मान में सबसे पहले चादर बिछाई गई। इसके सामने करीब 4 से 5 फीट ऊंचाई पर फूलों से शिवलिंग तैयार किया गया। परंपरा के मुताबिक सिंधिया परिवार की ओर से शिवलिंग को सम्मान स्वरूप पगड़ी पहनाई गई। इसके बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया शिवलिंग के सामने बैठकर आराधना में शामिल हुए। इस पूजा की सबसे खास बात इसकी अवधि है। परंपरा के मुताबिक परिवार के मुखिया कितनी देर तक आराधना करेंगे, यह पहले से तय नहीं होता। आराधना तब तक जारी रहती है, जब तक शिवलिंग से एक पुष्प नीचे बिछाई गई चादर पर आकर नहीं गिरता। परिवार से जुड़े लोगों के अनुसार पुष्प का चादर पर गिरना बाबा द्वारा पूजा स्वीकार करने और आशीर्वाद देने का प्रतीक माना जाता है।
ज्योतिरादित्य सिंधिया करीब एक घंटे तक आराधना में बैठे रहे। पूजा की प्रक्रिया के दौरान श्रद्धालु और परिवार से जुड़े लोग पुष्प के गिरने का इंतजार करते रहे। करीब एक घंटे की आराधना के बाद शिवलिंग से एक पुष्प चादर पर आकर गिरा। इसके बाद पूजा की प्रक्रिया पूरी की गई।
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सिंधिया परिवार के करीबी बाल खांडे के मुताबिक बाबा मंसूर अली शाह का सालाना उर्स हर वर्ष मनाया जाता है और इसमें सिंधिया परिवार के मुखिया के शामिल होने की परंपरा करीब 300 साल पुरानी बताई जाती है। उनके मुताबिक बाबा को सिंधिया परिवार का कुलगुरु और मार्गदर्शक भी माना जाता है।
बताया जाता है कि इसी परंपरा के तहत परिवार के मुखिया हर साल देवघर पहुंचकर बाबा की आराधना में शामिल होते हैं। सोमवार को भी पुष्प गिरने के बाद पूजा संपन्न हुई और ज्योतिरादित्य सिंधिया देवघर से रवाना हो गए। बाबा मंसूर अली शाह के सालाना उर्स के दौरान निभाई जाने वाली यह परंपरा ग्वालियर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का एक अलग स्वरूप सामने रखती है, जहां हिंदू और मुस्लिम परंपराओं के मेल के साथ सिंधिया परिवार की सदियों पुरानी आस्था जुड़ी हुई बताई जाती है।