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विश्व हिंदी दिवस: नागरी प्रचारिणी सभा...नौवीं कक्षा के छात्रों की सोच पर खड़ा हुआ काशी में हिंदी का गढ़

Mon, 10 Jan 2022 10:54 AM IST
वाराणसी ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: वाराणसी ब्यूरो Updated Mon, 10 Jan 2022 10:54 AM IST
सार

भारतेंदु युग के बाद हिंदी साहित्य की उल्लेखनीय गतिविधियों, उनके नियमन और नियंत्रण, संचालन में महत्वपूर्ण योगदान के लिए जानी जाने वाली नागरी प्रचारिणी प्रचारिणी की स्थापना वाराणशी के क्वींस कॉलेज में नौवीं कक्षा के तीन छात्रों  ने की थी। 

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World Hindi day 2022 varanasi Nagari pracharini sabha The stronghold of Hindi in Kashi stood on the thinking of the students of class IX
नागरी प्रचारिणी सभा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सकारात्मक सोच ऐतिहासिक परिवर्तन का कारण बनती है। बनारस में नागरी प्रचारिणी सभा इसकी जीती जागती मिसाल है। नौवीं कक्षा के छात्रों की सोच पर काशी में हिंदी का गढ़ नागरी प्रचारिणी सभा का निर्माण हुआ। हिंदी का गढ़ कहे जाने वाली नागरी प्रचारिणी सभा ने हिंदी को दुनिया में एक अलग पहचान दिलाई।
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सभा ने अभियान चला कर मठों-मंदिरों व राजाओं के यहां पड़ी पुस्तकों की न केवल खोज की बल्कि इन पुस्तकों की प्रमाणिकता भी सिद्ध की। नागरी प्रचारिणी सभा के सहायक मंत्री बृजेश चंद्र पांडेय ने बताया कि क्वींस इंटर कॉलेज के बरामदे में नौवीं कक्षा के छात्र बाबू श्यामसुंदर दास, पं. रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह ने कॉलेज के छात्रावास के बरामदे में बैठकर की थी।
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भारतेंदु हरिश्चंद्र के फुफेरे भाई थे पहले अध्यक्ष
यह वह समय था जब अग्रेजी, उर्दू और फारसी का बोलबाला था तथा हिंदी का प्रयोग करनेवाले बड़ी हेय दृष्टि से देखे जाते थे। आधुनिक हिंदी के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र के फुफेरे भाई बाबू राधाकृष्ण दास इसके पहले अध्यक्ष हुए।
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पढ़ेंः विश्व हिंदी दिवस: बनारस हिंदी की जन्मस्थली, यहीं से मिला व्याकरण और शब्दों का अनुशासन
 

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नागरी प्रचारिणी सभा - फोटो : अमर उजाला

साहित्यकार डॉ. इंदीवर पांडेय ने बताया कि काशी के सप्तसागर मुहल्ले के घुड़साल में इसकी बैठक होती थी। बाद में इस संस्था का स्वतंत्र भवन बना। पहले साल महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी, इब्राहिम जार्ज ग्रियर्सन, अंबिकादत्त व्यास, चौधरी प्रेमघन जैसे ख्यातिलब्ध विद्वान इसके सदस्य बने। सभा के प्रयत्न से सन 1900 से उत्तर प्रदेश तत्कालीन संयुक्त प्रदेश में नागरी के प्रयोग की आज्ञा हुई और सरकारी कर्मचारियों के लिए हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं का जानना अनिवार्य कर दिया गया।

काशी में बदहाल है हिंदी का गढ़, लापरवाही ने बिगाड़े हालात

हिंदी के प्रचार और शोध के लिए 16 जुलाई, 1893 में स्थापित संस्था नागरी प्रचारिणी सभा फिलहाल अपने पूर्वजों के पुण्य-प्रताप के सहारे किसी तरह जिंदा है। नागरी प्रचारिणी के पास 20 हजार से अधिक पांडुलिपियां और 50 हजार से अधिक पुरानी पत्रिकाएं और 1.25 लाख से अधिक ग्रंथों का भंडार है।
साहित्यकार डॉ. गया सिंह ने बताया कि खड़ी बोली हिंदी को आकार देने वाली नागरी प्रचारिणी सभा आज बदहाली के दौर से गुजर रही है।

नागरी प्रचारिणी सभा का स्वतंत्रता आंदोलन में भी रहा योगदान

World Hindi day 2022 varanasi Nagari pracharini sabha The stronghold of Hindi in Kashi stood on the thinking of the students of class IX
नागरी प्रचारिणी सभा। - फोटो : अमर उजाला।
हिंदी की इस थाती के संरक्षण के लिए संस्था के पास पर्याप्त धन नहीं है। मामूली मानदेय पर तैनात कर्मचारी हिंदी साहित्य की इस अनमोल थाती की रखवाली कर रहे हैं। बताया कि नागरी प्रचारिणी सभा अपने हाल पर किसी तरह जिंदा है। इसका स्वतंत्रता आंदोलन में भी बहुत बड़ा योगदान रहा है।
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