विश्व हिंदी दिवस: नागरी प्रचारिणी सभा...नौवीं कक्षा के छात्रों की सोच पर खड़ा हुआ काशी में हिंदी का गढ़
भारतेंदु युग के बाद हिंदी साहित्य की उल्लेखनीय गतिविधियों, उनके नियमन और नियंत्रण, संचालन में महत्वपूर्ण योगदान के लिए जानी जाने वाली नागरी प्रचारिणी प्रचारिणी की स्थापना वाराणशी के क्वींस कॉलेज में नौवीं कक्षा के तीन छात्रों ने की थी।
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सभा ने अभियान चला कर मठों-मंदिरों व राजाओं के यहां पड़ी पुस्तकों की न केवल खोज की बल्कि इन पुस्तकों की प्रमाणिकता भी सिद्ध की। नागरी प्रचारिणी सभा के सहायक मंत्री बृजेश चंद्र पांडेय ने बताया कि क्वींस इंटर कॉलेज के बरामदे में नौवीं कक्षा के छात्र बाबू श्यामसुंदर दास, पं. रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह ने कॉलेज के छात्रावास के बरामदे में बैठकर की थी।
भारतेंदु हरिश्चंद्र के फुफेरे भाई थे पहले अध्यक्ष
यह वह समय था जब अग्रेजी, उर्दू और फारसी का बोलबाला था तथा हिंदी का प्रयोग करनेवाले बड़ी हेय दृष्टि से देखे जाते थे। आधुनिक हिंदी के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र के फुफेरे भाई बाबू राधाकृष्ण दास इसके पहले अध्यक्ष हुए।
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साहित्यकार डॉ. इंदीवर पांडेय ने बताया कि काशी के सप्तसागर मुहल्ले के घुड़साल में इसकी बैठक होती थी। बाद में इस संस्था का स्वतंत्र भवन बना। पहले साल महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी, इब्राहिम जार्ज ग्रियर्सन, अंबिकादत्त व्यास, चौधरी प्रेमघन जैसे ख्यातिलब्ध विद्वान इसके सदस्य बने। सभा के प्रयत्न से सन 1900 से उत्तर प्रदेश तत्कालीन संयुक्त प्रदेश में नागरी के प्रयोग की आज्ञा हुई और सरकारी कर्मचारियों के लिए हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं का जानना अनिवार्य कर दिया गया।
काशी में बदहाल है हिंदी का गढ़, लापरवाही ने बिगाड़े हालात
हिंदी के प्रचार और शोध के लिए 16 जुलाई, 1893 में स्थापित संस्था नागरी प्रचारिणी सभा फिलहाल अपने पूर्वजों के पुण्य-प्रताप के सहारे किसी तरह जिंदा है। नागरी प्रचारिणी के पास 20 हजार से अधिक पांडुलिपियां और 50 हजार से अधिक पुरानी पत्रिकाएं और 1.25 लाख से अधिक ग्रंथों का भंडार है।
साहित्यकार डॉ. गया सिंह ने बताया कि खड़ी बोली हिंदी को आकार देने वाली नागरी प्रचारिणी सभा आज बदहाली के दौर से गुजर रही है।
नागरी प्रचारिणी सभा का स्वतंत्रता आंदोलन में भी रहा योगदान