बभनियांव में मिला खजुराहो जैसा शिव मंदिर, 1400 साल पुराने स्थापत्य शिल्प का बेहतरीन नमूना
वाराणसी के बभनियांव में जारी पुरातत्व विभाग की खुदाई में शिव मंदिर होने की पुष्टि हुई है। यह 1400 साल पुराने स्थापत्य शिल्प का बेहतरीन नमूना है। यह उसी शैली में बना है, जैसा खजुराहो का विश्वनाथ मंदिर है। यानी इसका निर्माण भी पंचायतन शैली में कराया गया होगा। बीएचयू के पुरातत्व विभाग की टीम अब इसी को आधार मानकर आगे खुदाई करा रही है।
अब तक की खुदाई में जो साक्ष्य सामने आएं हैं, उससे पता चलता है कि बभनियांव में 1400 साल पहले भी जीवनशैली शैव परंपरा पर आधारित थी। दरअसल, खुदाई में मिला शिवलिंग पश्चिम मुखी है। आमतौर पर पश्चिम मुखी शिवलिंग कम मिलते हैं। शिवलिंग के 10 मीटर दूर जमीन से करीब छह फीट नीचे एक बड़ा शिवलिंग है। पंचायतन शैली के मंदिर की संभावना मिलने के बाद बीएचयू की टीम आसपास क्षेत्र की खुदाई की तैयारी कर रही है।
उनका मानना है कि मंदिर के आसपास चार मीटर तक खुदाई की जाती है तो नंदी की प्रतिमा मिल सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, अब तक 1400 साल पुराने साक्ष्य मिले हैं। अभी और प्राचीन साक्ष्य मिलने की उम्मीद है। जल्द ही मुख्य मंदिर के पास भी खुदाई की जाएगी। इससे कई ऐतिहासिक साक्ष्य मिलेंगे और इसकी प्राचनीता स्पष्ट होगी। पंचक्रोशी परिक्रमा के अस्तित्व को भी वैज्ञानिक आधार मिलेगा।
जानें पंचायतन शैली के बारे में
पंचायतन शैली के शिव मंदिरों में मुख्य शिवलिंग बीच में होता है और यह पूर्वमुखी होता है। इसके चारों ओर चार शिवलिंग स्थापित किए जाते हैं। इस शैली के मंदिरों में सबसे प्रसिद्ध मंदिर खजुराहो का विश्वनाथ मंदिर है। सारनाथ में बना सारंगदेव मंदिर भी पंचायतन शैली में बना है।
आठवीं शताब्दी की हैं मूर्तियां
खुदाई में अब तक महिषासुर मर्दिनी, गंगाधर शिव की मूर्तियां मिल चुकी हैं। इसके अलावा मां पार्वती की एक मूर्ति के एक हाथ में दर्पण है, लिहाजा इसे सौंदर्य का प्रतीक माना जा रहा है। उनकी गोद में उनके पुत्र कार्तिकेय हैं। एक नौवीं शताब्दी की मूर्ति है जो खंडित है, लेकिन उसका प्रभाव मंडल बता रहा है कि वह स्वतंत्र देवता के रूप में किसी हनुमान मंदिर में स्थापित थी। मूर्ति विशेषज्ञ इन्हें रेयरेस्ट बता रहे हैं। विशेषज्ञों की माने तो ये सभी मूर्तियां आठवीं शताब्दी की हैं।
फिलहाल कार्बन डेटिंग नहीं
पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार, अभी तक जो वस्तुएं मिली हैं, उनकी शैली से ही उनके काल की पुष्टि हो जाती है। इनकी बनावट और वास्तु गुप्त कालीन शैव काल के इतिहास में वर्णित साक्ष्यों से मिल रहे हैं। ऐसे में फिलहाल कार्बन डेटिंग की जरूरत नहीं है। खुदाई में यदि कोई ऐसी वस्तु मिलती है, जिनके बारे में अभिलेख मौजूद नहीं है, तब कार्बन डेटिंग पर विचार किया जाएगा।
नौ साल में ही बदली तस्वीर
बीएचयू की पुरातत्व विभाग की टीम को 2011 में यहां प्राचीन सभ्यता होने की संभावना दिखी थी, लेकिन तब कुछ खास नहीं मिला था। इन नौ सालों में इस इलाके की तस्वीर ही बदल गई और यहां खेती शुरू हो गई। कई खेतों में जेसीबी से मिट्टी निकलवाने और भरवाने का काम किया गया। टीम को आशंका है कि इससे कई साक्ष्य नष्ट हुए होंगे।
अकथा और अगियाबीर के बाद जुड़ा बभनियांव का नाम
काशी के प्राचीनतम स्थलों में अकथा (सारनाथ के पास) और अगियाबीर (भदोही जिले में द्वारिकापुर) के साथ बभनियांव का नाम भी जुड़ गया है। इससे पहले अकथा और अगियाबीर में करीब 2500 साल पुराने जीवन के साक्ष्य मिले थे।
जमीन के छह फीट नीचे शिवलिंग के आसपास भी जल्द ही खुदाई कराई जाएगी। अब तक मिले साक्ष्यों के आधार पर माना जा सकता है कि ये मंदिर गुप्तकाल के प्रारंभ में बने हैं। जैसे-जैसे खुदाई बढ़ती जाएगी, और भी स्पष्टता आती जाएगी। मंगलवार को खुदाई के पहले स्थान पर ईंटों से बने शिवलिंग का गर्भगृह मिला है जो ऐतिहासिकता के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण है।
प्रो. अशोक कुमार सिंह, बीएचयू