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रेलवे में खत्म हो दोहरी सुरक्षा व्यवस्था
Varanasi
Updated Sat, 30 Nov 2013 05:42 AM IST
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वाराणसी। रेलवे में दोहरी सुरक्षा व्यवस्था खत्म करने की मांग अखिल भारतीय रेलवे सुरक्षा बल एसोसिएशन के उत्तर रेलवे, लखनऊ मंडल के छठे अधिवेशन में पुरजोर तरीके से उठी। कैंट स्टेशन स्थित प्रेक्षागृह में शुक्रवार को आयोजित अधिवेशन से पूर्व पत्रकारों से बातचीत में राष्ट्रीय अध्यक्ष एसआर रेड्डी और महासचिव यूएस झा ने कहा कि यात्रियों की सुरक्षा केंद्र और राज्य सरकार के नियमों के पेच में फंसी हुई है। इसके चलते यात्री लूटे जा रहे हैं और कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है।
अध्यक्ष रेड्डी ने कहा कि रेलवे संपत्ति की सुरक्षा आरपीएफ के जिम्मे है, जबकि कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी जीआरपी की है। आरपीएफ के जवान किसी अपराधी को पकड़ते हैं तो उसे जीआरपी को सौंपना पड़ता। जीआरपी क्या कार्रवाई करती है? इसकी जानकारी आरपीएफ को नहीं हो पाती है। इससे सुरक्षा के मामले में टालमटोल होती रहती है। दुनिया के कई देशों में इस तरह की दोहरी प्रणाली लागू थी लेकिन उन्होंने मुश्किलों को देखते हुए इसको खत्म कर दिया। रेलवे एक्ट के उल्लंघन का मामला आरपीएफ के पास है। लेकिन पहुंच और पैसे वालों को पकड़ना मुश्किल होता है। लिहाजा गरीबों को गिरफ्तार कर लक्ष्य पूरा किया जाता है। इस तरह गरीबों का ही उत्पीड़न होता है और आम लोगों को अपराधी बनाया जाता है।
महासचिव झा ने कहा कि आरपीएफ में 40 फीसदी जवानों की कमी है। 15 फीसदी जवानों को अधिकारियों के बंगले और उनकी सुरक्षा में लगा दिया जाता है। केवल 45 फीसदी जवान ही यात्रियों और रेलवे संपत्ति की सुरक्षा करते है। आरपीएफ में सुपरवाइजरी स्टाफ की संख्या ज्यादा हो गई, काम करने वालों की कम है। अपराधियों का निशाना ट्रेनें बन रही हैं। बाद में अधिवेशन में आरपीएफ जवानों की समस्याओं पर चर्चा की गई। इसमें केडी सिंह, धर्मवीर सिंह, देवेंद्र कुमार सिंह, रविंद्र मिश्रा आदि ने विचार व्यक्त किए।
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अध्यक्ष रेड्डी ने कहा कि रेलवे संपत्ति की सुरक्षा आरपीएफ के जिम्मे है, जबकि कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी जीआरपी की है। आरपीएफ के जवान किसी अपराधी को पकड़ते हैं तो उसे जीआरपी को सौंपना पड़ता। जीआरपी क्या कार्रवाई करती है? इसकी जानकारी आरपीएफ को नहीं हो पाती है। इससे सुरक्षा के मामले में टालमटोल होती रहती है। दुनिया के कई देशों में इस तरह की दोहरी प्रणाली लागू थी लेकिन उन्होंने मुश्किलों को देखते हुए इसको खत्म कर दिया। रेलवे एक्ट के उल्लंघन का मामला आरपीएफ के पास है। लेकिन पहुंच और पैसे वालों को पकड़ना मुश्किल होता है। लिहाजा गरीबों को गिरफ्तार कर लक्ष्य पूरा किया जाता है। इस तरह गरीबों का ही उत्पीड़न होता है और आम लोगों को अपराधी बनाया जाता है।
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महासचिव झा ने कहा कि आरपीएफ में 40 फीसदी जवानों की कमी है। 15 फीसदी जवानों को अधिकारियों के बंगले और उनकी सुरक्षा में लगा दिया जाता है। केवल 45 फीसदी जवान ही यात्रियों और रेलवे संपत्ति की सुरक्षा करते है। आरपीएफ में सुपरवाइजरी स्टाफ की संख्या ज्यादा हो गई, काम करने वालों की कम है। अपराधियों का निशाना ट्रेनें बन रही हैं। बाद में अधिवेशन में आरपीएफ जवानों की समस्याओं पर चर्चा की गई। इसमें केडी सिंह, धर्मवीर सिंह, देवेंद्र कुमार सिंह, रविंद्र मिश्रा आदि ने विचार व्यक्त किए।
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