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Siddharthnagar News: कहने को मिनी जिला अस्पताल पर रेफरल सेंटर बन कर रह गया
Mon, 15 Sep 2025 11:22 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Mon, 15 Sep 2025 11:22 PM IST
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शैय्यायुक्त संयुक्त चिकित्सालय बांसी से रेफर होने के बाद मरीज को ले जाती एंबुलेंस। संवाद
बांसी/सकारपार। बांसी तहसील मुख्यालय पर 14 करोड़ रुपये की लागत से 50 शैय्यायुक्त संयुक्त चिकित्सालय रेफर सेंटर बनकर रह गया है। बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने का दावा बेदम साबित हो रहा है।
कारण मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए बकायदा तीन सर्जन सहित 11 डॉक्टरों की तैनाती की गई है। इसके अस्तित्व में आने के बाद बांसी के अलावा डुमरियागंज एवं इटवा क्षेत्र से लगभग पांच लाख की आबादी के लोग स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पहुंचते हैं, लेकिन उन्हें इलाज में सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। बांसी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को 50 बेड का जिला अस्पताल बना दिया गया, जिससे क्षेत्र के लोगों को लाभ मिल सके, लेकिन इसके बाद भी उन्हे सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। अस्पताल पूर्ण रूप से बनकर तैयार हो गया है।
अस्पताल में रोजाना करीब 600 से 700 मरीजों की ओपीडी होती है। लेकिन अस्पताल में कुछ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध न होने की वजह से मरीजों को बाहर भटकना पड़ता है।
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अस्पताल में अभी तक एक्स-रे मशीन संचालित नहीं की गई है। इससे मरीजों को एक्स-रे करवाने के लिए बाहर निजी पैथोलॉजी पर जाकर 300 से 400 रुपये खर्च करना पड़ता है। सोनखर टेढ़ी निवासी धरम शीला ने बताया कि यहां पर एक्स-रे सुविधा न रहने की वजह से बाहर से 300 रुपये देकर करवाना पड़ा है।
इससे मरीजों पर आर्थिक बोझ पड़ता है। वहीं अस्पताल में अभी तक अल्ट्रासाउंड की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। डॉक्टरों की सलाह पर जिन मरीजों को अल्ट्रासाउंड करवाने की जरूरत पड़ती है, वह बाहर निजी पैथोलॉजी पर जाकर 500 से 600 रुपये देकर अल्ट्रासाउंड करवाते हैं।
अस्पताल पर 600 ओपीडी के बीच लगभग 40 से 50 लोगों को एक्स-रे एवं अल्ट्रासाउंड करने की जरूरत पड़ती है। ऐसे मरीजों को इन सेवाओं के लिए बाहर भटकना पड़ता है।
अस्पताल पर 24 घंटे के आंकड़े के अनुसार लगभग 60 से 70 मरीज इमरजेंसी के पहुंचते हैं। जिसमें रोजाना करीब 10 से 15 गंभीर मरीजों को यहां पर उच्च स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में रेफर कर दिया जाता है, जिसमें अक्सर एक्सीडेंटल एवं हार्ट से संबंधित मरीज रहते हैं। मौके पर नेत्र के डॉक्टर भी अस्पताल पर उपलब्ध नहीं मिले। आंख के मरीजों को निराश होकर लौट जाना पड़ा। आंख की मरीज झुड़िया बुजुर्ग निवासी प्रिया त्रिपाठी ने बताया तीन-चार बार आने के बावजूद भी आंख के डॉक्टर से संपर्क नहीं हुआ। यहां पर बेहोशी के डॉक्टर की अभी तक तैनाती नहीं हुई है।
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कारण मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए बकायदा तीन सर्जन सहित 11 डॉक्टरों की तैनाती की गई है। इसके अस्तित्व में आने के बाद बांसी के अलावा डुमरियागंज एवं इटवा क्षेत्र से लगभग पांच लाख की आबादी के लोग स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पहुंचते हैं, लेकिन उन्हें इलाज में सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। बांसी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को 50 बेड का जिला अस्पताल बना दिया गया, जिससे क्षेत्र के लोगों को लाभ मिल सके, लेकिन इसके बाद भी उन्हे सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। अस्पताल पूर्ण रूप से बनकर तैयार हो गया है।
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अस्पताल में रोजाना करीब 600 से 700 मरीजों की ओपीडी होती है। लेकिन अस्पताल में कुछ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध न होने की वजह से मरीजों को बाहर भटकना पड़ता है।
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अस्पताल में अभी तक एक्स-रे मशीन संचालित नहीं की गई है। इससे मरीजों को एक्स-रे करवाने के लिए बाहर निजी पैथोलॉजी पर जाकर 300 से 400 रुपये खर्च करना पड़ता है। सोनखर टेढ़ी निवासी धरम शीला ने बताया कि यहां पर एक्स-रे सुविधा न रहने की वजह से बाहर से 300 रुपये देकर करवाना पड़ा है।
इससे मरीजों पर आर्थिक बोझ पड़ता है। वहीं अस्पताल में अभी तक अल्ट्रासाउंड की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। डॉक्टरों की सलाह पर जिन मरीजों को अल्ट्रासाउंड करवाने की जरूरत पड़ती है, वह बाहर निजी पैथोलॉजी पर जाकर 500 से 600 रुपये देकर अल्ट्रासाउंड करवाते हैं।
अस्पताल पर 600 ओपीडी के बीच लगभग 40 से 50 लोगों को एक्स-रे एवं अल्ट्रासाउंड करने की जरूरत पड़ती है। ऐसे मरीजों को इन सेवाओं के लिए बाहर भटकना पड़ता है।
अस्पताल पर 24 घंटे के आंकड़े के अनुसार लगभग 60 से 70 मरीज इमरजेंसी के पहुंचते हैं। जिसमें रोजाना करीब 10 से 15 गंभीर मरीजों को यहां पर उच्च स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में रेफर कर दिया जाता है, जिसमें अक्सर एक्सीडेंटल एवं हार्ट से संबंधित मरीज रहते हैं। मौके पर नेत्र के डॉक्टर भी अस्पताल पर उपलब्ध नहीं मिले। आंख के मरीजों को निराश होकर लौट जाना पड़ा। आंख की मरीज झुड़िया बुजुर्ग निवासी प्रिया त्रिपाठी ने बताया तीन-चार बार आने के बावजूद भी आंख के डॉक्टर से संपर्क नहीं हुआ। यहां पर बेहोशी के डॉक्टर की अभी तक तैनाती नहीं हुई है।