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Shahjahanpur News: आजादी की लड़ाई में 13 वर्ष तक भोगा कारावास
Thu, 15 Aug 2024 03:27 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर
Updated Thu, 15 Aug 2024 03:27 AM IST
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हरिप्रसाद मिश्रा सत्यप्रेमी फाइल फोटो। स्रोत शशांक मिश्र
पुवायां। बड़ागांव के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हरिप्रसाद मिश्रा सत्यप्रेमी ने पारिवारिक हितों की अपेक्षा देशहित और समाजहित को महत्व दिया। अपनी पुस्तक ब्रिटिश शासन और उससे मुक्ति की कहानी में उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन, कारावास सहित तमाम मामलों का जिक्र किया है।
एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे सत्यप्रेमी की शुरुआती शिक्षा कस्बे के मिडिल स्कूल से हुई थी और कर्मभूमि शाहजहांपुर रही। बाद में वह बाराबंकी चले गए, जहां उनके नाम पर तमाम मार्ग आदि हैं, लेकिन कस्बे में उनके नाम से कोई पार्क, द्वार व सड़क तक नहीं है। पुस्तक ब्रिटिश शासन और उससे मुक्ति की कहानी में उन्होंने आजादी की लड़ाई के चलते 1921 से 1934 तक कारावास में डाले जाने का जिक्र किया है।
पुस्तक के अनुसार, उनकी संपत्तियों को कई बार अंग्रेज सरकार ने कुर्क कर दिया था। वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय होने पर उनके बड़ागांव के मकान को भी कुर्क कर लिया गया था। पुस्तक के अनुसार, जवाहरलाल नेहरू 1921 के आसपास अपनी पुत्री इंदिरा प्रियदर्शिनी के साथ उनके बड़ागांव के आवास पर आए थे।
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सात पुस्तकें भी लिखीं
हरिप्रसाद मिश्रा सत्यप्रेमी नेे सात पुस्तकेंं राष्ट्रभेरी, हमारी सामाजिक कुरीतियां, सुलभ चिकित्सा व घरेलू वैद्य, भारत में ब्रिटिश शासन और उससे मुक्ति की कहानी, मुक्ति के मार्ग, शिक्षाप्रद दोहे और स्वर्ण सीकर लिखी है। भारत में ब्रिटिश शासन और उससे मुक्ति की कहानी में उन्होंने यूरोपीय आविष्कारों और भौतिकतावादी पर लिखा है कि मानव अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति की उपेक्षा कर रहा है, लिखा है कि-भूलता जाता है है यूरोप आसमानी बाप को, बस खुदा समझा है उसने वर्क को और भाप को।
परिवार से जुड़े शशांक मिश्रा भारती ने हरिप्रसाद मिश्र पर एक स्मारिका का प्रकाशन वर्ष 2018 में किया है, जिसमें तमाम जानकारियां दी गई हैं। हरिप्रसाद मिश्र का स्वर्गवास 1956-57 के आसपास माना जाता है। उनका कोई भी चित्र तक उपलब्ध नहीं है। एक चित्रकार के माध्यम से बनाया गया चित्र ही कुछ लोगों के पास है।
याद करो कुर्बानी.....
शहीद मौलवी अहमद उल्ला शाह की शहीद स्थली पुवायां की धरा वीर प्रसूता रही है। आजादी के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले पुवायां के रामसेवक शुक्ला, लाला ओमकारनाथ अग्रवाल, बिहारीलाल अग्रवाल, कहमारा के नरायनलाल, आवां दुगइया के ढाकनलाल, बसखेड़ा के श्यामसुंदर लाल मिश्रा, जुझारपुर के श्यामलाल, प्रहलाद राम, स्वामीदयाल, भज्जूलाल, अनंतराम तिवारी, अनावा की इंद्रलोचन, नगरिया के कढ़ेराम, खजुरिया के जगन्नाथ प्रसाद, इटौली के रामविलास, बड़ागांव के हरिप्रसाद सत्यप्रेमी, बसंतापुर के सरकार रूढ़ सिंह, पटई के अमर सिंह का योगदान कभी नहीं भुलाया जा सकता है।
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एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे सत्यप्रेमी की शुरुआती शिक्षा कस्बे के मिडिल स्कूल से हुई थी और कर्मभूमि शाहजहांपुर रही। बाद में वह बाराबंकी चले गए, जहां उनके नाम पर तमाम मार्ग आदि हैं, लेकिन कस्बे में उनके नाम से कोई पार्क, द्वार व सड़क तक नहीं है। पुस्तक ब्रिटिश शासन और उससे मुक्ति की कहानी में उन्होंने आजादी की लड़ाई के चलते 1921 से 1934 तक कारावास में डाले जाने का जिक्र किया है।
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पुस्तक के अनुसार, उनकी संपत्तियों को कई बार अंग्रेज सरकार ने कुर्क कर दिया था। वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय होने पर उनके बड़ागांव के मकान को भी कुर्क कर लिया गया था। पुस्तक के अनुसार, जवाहरलाल नेहरू 1921 के आसपास अपनी पुत्री इंदिरा प्रियदर्शिनी के साथ उनके बड़ागांव के आवास पर आए थे।
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सात पुस्तकें भी लिखीं
हरिप्रसाद मिश्रा सत्यप्रेमी नेे सात पुस्तकेंं राष्ट्रभेरी, हमारी सामाजिक कुरीतियां, सुलभ चिकित्सा व घरेलू वैद्य, भारत में ब्रिटिश शासन और उससे मुक्ति की कहानी, मुक्ति के मार्ग, शिक्षाप्रद दोहे और स्वर्ण सीकर लिखी है। भारत में ब्रिटिश शासन और उससे मुक्ति की कहानी में उन्होंने यूरोपीय आविष्कारों और भौतिकतावादी पर लिखा है कि मानव अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति की उपेक्षा कर रहा है, लिखा है कि-भूलता जाता है है यूरोप आसमानी बाप को, बस खुदा समझा है उसने वर्क को और भाप को।
परिवार से जुड़े शशांक मिश्रा भारती ने हरिप्रसाद मिश्र पर एक स्मारिका का प्रकाशन वर्ष 2018 में किया है, जिसमें तमाम जानकारियां दी गई हैं। हरिप्रसाद मिश्र का स्वर्गवास 1956-57 के आसपास माना जाता है। उनका कोई भी चित्र तक उपलब्ध नहीं है। एक चित्रकार के माध्यम से बनाया गया चित्र ही कुछ लोगों के पास है।
याद करो कुर्बानी.....
शहीद मौलवी अहमद उल्ला शाह की शहीद स्थली पुवायां की धरा वीर प्रसूता रही है। आजादी के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले पुवायां के रामसेवक शुक्ला, लाला ओमकारनाथ अग्रवाल, बिहारीलाल अग्रवाल, कहमारा के नरायनलाल, आवां दुगइया के ढाकनलाल, बसखेड़ा के श्यामसुंदर लाल मिश्रा, जुझारपुर के श्यामलाल, प्रहलाद राम, स्वामीदयाल, भज्जूलाल, अनंतराम तिवारी, अनावा की इंद्रलोचन, नगरिया के कढ़ेराम, खजुरिया के जगन्नाथ प्रसाद, इटौली के रामविलास, बड़ागांव के हरिप्रसाद सत्यप्रेमी, बसंतापुर के सरकार रूढ़ सिंह, पटई के अमर सिंह का योगदान कभी नहीं भुलाया जा सकता है।