{"_id":"6aaaf581234a7e3505086562","slug":"the-threat-of-ozone-in-leh-s-air-is-the-himalayas-too-not-immune-to-pollution-2026-09-17","type":"story","status":"publish","title_hn":"लेह की हवा में घुला ओजोन का खतरा: 3500 मीटर की ऊंचाई पर एक्यूआई 300, क्या हिमालय भी प्रदूषण से अछूता नहीं!","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
लेह की हवा में घुला ओजोन का खतरा: 3500 मीटर की ऊंचाई पर एक्यूआई 300, क्या हिमालय भी प्रदूषण से अछूता नहीं!
Thu, 17 Sep 2026 01:31 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, लेह
अमर उजाला नेटवर्क, लेह
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Thu, 17 Sep 2026 01:31 AM IST
सार
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार लेह में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 300 दर्ज किया गया, जो बेहद खराब श्रेणी है। 15 सितंबर को यह 205 था। यानी एक दिन में 95 अंक की वृद्धि हुई।
विज्ञापन
दुर्गम पहाड़ पर प्रदूषण....
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
लद्दाख की पहचान दुनिया के उन पर्यटन स्थलों में होती है जहां खुला आसमान, विरल आबादी और ऊंचे पहाड़ अपेक्षाकृत साफ हवा का अहसास कराते हैं। लेकिन 16 सितंबर 2026 के आंकड़े इस धारणा को चुनौती देने वाला संकेत दे रहे हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार लेह में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 300 दर्ज किया गया, जो बेहद खराब श्रेणी है। 15 सितंबर को यह 205 था। यानी एक दिन में 95 अंक की वृद्धि हुई। खास बात यह है कि उपलब्ध आंकड़ों में ओजोन प्रमुख प्रदूषकों में शामिल रही।
विज्ञापन
विशेषज्ञों के अनुसार पहाड़ों की ऊंचाई प्रदूषण से सुरक्षा की गारंटी नहीं है।लेह करीब 3,500 मीटर की ऊंचाई पर है। यहां दिल्ली, मुंबई या औद्योगिक शहरों जैसी भारी औद्योगिक गतिविधियां नहीं हैं। फिर भी वायु गुणवत्ता खराब हो सकती है। इसकी एक वजह स्थानीय उत्सर्जन है। पर्यटन के साथ वाहनों की आवाजाही, होटल और निर्माण गतिविधियां तथा बिजली के लिए जनरेटर जैसे स्रोत बढ़ते हैं।
विज्ञापन
लेकिन ओजोन की कहानी थोड़ी अलग है
जमीन के नजदीक मौजूद ओजोन सीधे वाहन के धुएं से बाहर नहीं निकलती। यह द्वितीयक प्रदूषक है। वाहनों और अन्य स्रोतों से निकलने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा वाष्पशील कार्बनिक यौगिक सूर्य के प्रकाश में रासायनिक प्रतिक्रियाएं करते हैं और ओजोन बन सकती है। इस प्रक्रिया पर धूप, तापमान, हवा की दिशा और वातावरण में मौजूद रसायनों का प्रभाव पड़ता है।इसलिए लेह में ओजोन की मौजूदगी को केवल “स्थानीय धुएं” से जोड़ना सही नहीं होगा। इसके पीछे स्थानीय उत्सर्जन के साथ मौसम और क्षेत्रीय स्तर पर प्रदूषकों का परिवहन भी भूमिका निभा सकता है।
विज्ञापन
लेह में बढ़ता पर्यटन क्यों महत्वपूर्ण है?
लद्दाख में पर्यटन पिछले वर्षों में तेजी से बढ़ा है। पर्यटकों के साथ बड़ी संख्या में वाहन भी पहुंचते हैं। सड़क परिवहन से निकलने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड और अन्य गैसें ओजोन बनने की रासायनिक प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण कच्चा माल हो सकती हैं।इसका मतलब यह नहीं कि एक दिन का एक्यूआई 300 सीधे पर्यटन के कारण हुआ। इसके लिए लंबे समय के प्रदूषण, मौसम, यातायात और रासायनिक संरचना के आंकड़ों का अध्ययन जरूरी है। लेकिन लगातार बढ़ता मानवीय दबाव ऐसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में निगरानी की जरूरत जरूर बढ़ाता है।
दुनिया के दूसरे पहाड़ी पर्यटन क्षेत्र भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं
यह समस्या केवल लद्दाख तक सीमित नहीं है। दुनिया के कई ऊंचाई वाले क्षेत्र भी वायु प्रदूषण और क्षेत्रीय प्रदूषक परिवहन से प्रभावित होते रहे हैं। तिब्बती पठार और हिमालय: वैज्ञानिक अध्ययनों में हिमालय-तिब्बत क्षेत्र के वातावरण में दक्षिण एशिया से पहुंचने वाले प्रदूषकों और ब्लैक कार्बन के प्रभाव की चर्चा हुई है। पहाड़ों की ऊंचाई प्रदूषकों को सीमा पार पहुंचने से नहीं रोकती।
स्विट्जरलैंड के आल्प्स
आल्प्स क्षेत्र में भी निचले इलाकों से वायु प्रदूषकों के पहुंचने और ऊंचाई के साथ प्रदूषण की रासायनिक संरचना बदलने पर शोध हुए हैं। यानी पर्वतीय पर्यटन क्षेत्र भी आसपास के व्यापक वायुमंडलीय तंत्र से जुड़े होते हैं।
अमेरिका के रॉकी पर्वत: यहां वैज्ञानिकों ने ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ओजोन की निगरानी की है। शोधों ने दिखाया है कि ऊंचे पर्वतीय इलाकों में ओजोन का स्तर केवल स्थानीय स्रोतों से निर्धारित नहीं होता; दूर-दराज के प्रदूषण और वातावरण की रासायनिक प्रक्रियाएं भी प्रभाव डाल सकती हैं। इन उदाहरणों का सबसे महत्वपूर्ण सबक यह है कि ऊंचाई यानी हमेशा साफ हवा मान लेना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है।
दमोह 17, लेह 300 लेकिन तुलना सावधानी से
16 सितंबर को दमोह में एक्यूआई 17 दर्ज किया गया, जबकि लेह में 300। दोनों के बीच बहुत बड़ा अंतर है। हालांकि एक्यूआई अलग- अलग प्रदूषकों की स्वास्थ्य- आधारित सीमाओं को ध्यान में रखकर बनाया जाता है, इसलिए केवल दो शहरों के एक्यूआई को देखकर प्रदूषण के कारणों की तुलना नहीं की जा सकती।लेह का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि वायु प्रदूषण का भूगोल बदल रहा है। अब सवाल केवल यह नहीं है कि दिल्ली, मुंबई या औद्योगिक शहरों में हवा कितनी खराब है। सवाल यह भी है कि क्या बढ़ता पर्यटन और बदलता वातावरण हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की हवा को प्रभावित कर रहा है।
ओजोन बढ़ी तो स्वास्थ्य पर क्या असर?
जमीन के पास अधिक ओजोन आंखों और श्वसन तंत्र में जलन पैदा कर सकती है। लंबे समय तक या अधिक सांद्रता में संपर्क सांस संबंधी समस्याओं को बढ़ा सकता है। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से श्वसन संबंधी समस्या वाले लोगों को विशेष सावधानी की जरूरत होती है।
अब सिर्फ एक्यूआई नहीं, पूरी हवा की निगरानी जरूरी
लेह जैसे पर्यटन स्थलों के लिए प्रदूषण की निगरानी का दायरा बढ़ाने की जरूरत है। पीएम2.5 और पीएम10 के साथ ओजोन, नाइट्रोजन ऑक्साइड, मौसम, हवा की दिशा और यातायात के आंकड़ों को एक साथ देखना होगा।
क्योंकि हिमालय की ऊंचाई प्रदूषण को रोकने वाली दीवार नहीं है। लेह में 300 का एक्यूआई एक दिन का आंकड़ा है, लेकिन यह एक बड़ा सवाल जरूर छोड़ता है,क्या जिन पहाड़ों को हम साफ हवा का आखिरी ठिकाना मानते हैं, वहां भी प्रदूषण धीरे-धीरे पहुंच रहा है? इसका जवाब लंबे समय के वैज्ञानिक आंकड़े देंगे।