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राकेट के हमलों और भारी गोलाबारी के बीच फंसे मुदित पोलैंड बॉर्डर के लिए हुए रवाना
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रामपुर। राकेट के हमलों के बाद धमाकों की गूंज और भारी गोलाबारी के बीच दहशत भरे माहौल से आखिरकार रामपुर के मुदित निकलने में सफल रहे। 1400 किलोमीटर से अधिक के सफर के लिए उन्हें किराए के रूप में पांच सौ डालर चुकाने पड़े। अब उनकी जेब भी खाली हो गई है। ऐसे में परिजनों को बेटे के खाने पीने की चिंता सता रही है। हालांकि, परिजन बेटे को डॉलर भेजने की जुगत में लगे हैं। वे चिंतित हैं कि किसी तरह बेटा बॉर्डर तक सुरक्षित तरीके से पहुंच जाए। वहीं, रामपुर की शजा उस्मान पोलैंड और आशीष हंगरी में स्वदेश लौटने के लिए फ्लाइट का इंतजार कर रहे हैं।
रफत कालोनी निवासी मुदित राजपूत एमबीबीएस करने के लिए यूक्रेन गए थे। यह उनका पहला साल ही था। वह खारकीव नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी के छात्र हैं। उनके पिता प्रेम सिंह ने बताया कि भारी बमबारी और राकेट से ताबड़तोड़ हमलों के धमाकों के बीच कई दिन बंकरों में गुजारे। निकलने का मौका नहीं मिल पा रहा था। लिहाजा, जब भारतीय दूतावास ने किसी भी हाल में निकलने के लिए एडवाइजरी जारी की, तो बमबारी के बीच पैदल ही निकल गए। 25 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद एक खाली भवन में उन्हें ठहराया गया, जहां वे तीन दिनों से रूके हुए थे। लेकिन, हालात इतने खराब थे कि वहां से निकलने का मौका नहीं मिल पा रहा था। शुक्रवार को मुदित ने एक बस चालक से संपर्क किया, तब जाकर बस मिली। जेब में पांच सौ डॉलर थे, जो बस चालक ने बतौर किराया ले लिए। जेब खाली हो गई। एक पैसा भी नहीं है। खाने पीने के लिए कुछ नहीं है। ऐसे में परिजनों को चिंता सता रही है। हालांकि, उनके परिजन उनके खाते में रुपये डलवाने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं, रामपुर की शजा उस्मान दूसरे दिन भी पोलैंड में रहीं, जबकि आशीष हंगरी में हैं। दोनों को ही स्वदेश लौटने के लिए फ्लाइट नहीं मिल पा रही है। उनका कहना है कि आगामी एक दो दिन में फ्लाइट मिल ही जाएगी।
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रफत कालोनी निवासी मुदित राजपूत एमबीबीएस करने के लिए यूक्रेन गए थे। यह उनका पहला साल ही था। वह खारकीव नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी के छात्र हैं। उनके पिता प्रेम सिंह ने बताया कि भारी बमबारी और राकेट से ताबड़तोड़ हमलों के धमाकों के बीच कई दिन बंकरों में गुजारे। निकलने का मौका नहीं मिल पा रहा था। लिहाजा, जब भारतीय दूतावास ने किसी भी हाल में निकलने के लिए एडवाइजरी जारी की, तो बमबारी के बीच पैदल ही निकल गए। 25 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद एक खाली भवन में उन्हें ठहराया गया, जहां वे तीन दिनों से रूके हुए थे। लेकिन, हालात इतने खराब थे कि वहां से निकलने का मौका नहीं मिल पा रहा था। शुक्रवार को मुदित ने एक बस चालक से संपर्क किया, तब जाकर बस मिली। जेब में पांच सौ डॉलर थे, जो बस चालक ने बतौर किराया ले लिए। जेब खाली हो गई। एक पैसा भी नहीं है। खाने पीने के लिए कुछ नहीं है। ऐसे में परिजनों को चिंता सता रही है। हालांकि, उनके परिजन उनके खाते में रुपये डलवाने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं, रामपुर की शजा उस्मान दूसरे दिन भी पोलैंड में रहीं, जबकि आशीष हंगरी में हैं। दोनों को ही स्वदेश लौटने के लिए फ्लाइट नहीं मिल पा रही है। उनका कहना है कि आगामी एक दो दिन में फ्लाइट मिल ही जाएगी।
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