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Lalitpur News: बुंदेलखंड में होलिका दहन के बाद धुलेड़ी मनाए जाने की है परंपरा
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एरच रही है हिरण्यकश्यप की राजधानी एरिकेच्छ
संवाद न्यूज एजेंसी
ललितपुर। बुंदेलखंड त्योहारों का क्षेत्र माना जाता है, यहां पर छोटे-बड़े सभी त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं। होली का त्योहार जो पूरे देश ही नहीं अन्य देशों में जहां भारतीय संख्या अधिक है मनाया जाता है। ऐतिहासिक रूप से होली का उद्गम स्थल बुंदेलखंड की धरा ही है। बुंदेलखंड के एरच धाम जो कभी हिरण्यकश्यप की राजधानी रही है, पुराने समय में इसका नाम एरिकेच्छ था, बाद में बदलकर इसका नाम एरज हो गया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार होलिका ने यहीं पर भक्त प्रहलाद को गोद में बैठाकर जलाने की कोशिश की थी। प्रहलाद के बचने पर लोगों ने धूल उड़ाकर खुशी मनाई थी, इसलिए इसे होली के त्योहार को बुंदेलखंड में धुलेड़ी के नाम से भी जाना जाता है।
होलिका के जलने और भक्त प्रहलाद के बचने के बाद लोगों ने धूल की होली खेलकर खुशी जाहिर की थी। तभी से यह परंपरा ललितपुर जिले में कायम है। दहन के बाद लोग पूरी आस्था से होलिका की पूजा व परिक्रमा करते हैं। इसके बाद उत्साही युवा रात से ही कीचड़ और धूल की होली खेलना शुरू कर देते हैं। प्रतिपदा (परमा) में पूरे दिन कीचड़, गोबर और धूल की होली चलती है। इसके पीछे मान्यता है कि किसानों की फसल पक जाने और घर आने की खुशी वह इस तरह मनाते हैं। कीचड़ और गोबर की होली में भी बुंदेलों में सौहार्द व प्रेम झलकता है। इसके बाद भाईदूज को सभी सुबह से ही रंग-गुलाल की होली खेलते हैं। धुलेड़ी केे पीछे एक मान्यता है यह भी है कि जब भक्त प्रह्लाद को उसकी बुआ होलिका ने गोदी में बैठाकर आग से जलाकर भस्म करने का प्रयास किया, तो भक्त प्रह्लाद तो बच गए, लेकिन होलिका आग में जल गई। विष्णु उपासकों और देवताओं ने भक्त प्रह्लाद के बचने की खुशी में उत्सव मनाया और होलिका दहन की भस्म को माथे व पूरे शरीर पर लगाया। धीरे-धीरे परम्परा ने जन्म ले लिया और होलिका दहन की भस्म को जल में मिश्रित करके धारण किया जाने लगा। जिसको भस्म नहीं मिल पाई, उसने होलिका दहन स्थल की धूल को ही जल में मिश्रित कर माथे से लगा लिया। बाद में यह नालों के कीचड़ में बदल गया, जो एक कुरीति के रूप में ऩजर आने लगा।
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आटे की लोई को पूरे शरीर में फेरकर होलिका की अग्नि दहन की है परंपरा
बुंदेलखंड में यह भी परंपरा है कि आटे की गोली (लोई) को घर के बच्चों पूरे शरीर पर फेरा जाता है। इसके बाद इस आटे की लोई को होलिका स्थल से घर लाई गई आग में दहन कर दिया जाता है। मान्यता है कि इससे शरीर को संक्रमण जनित रोगों से छुटकारा मिल जाता है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
ललितपुर। बुंदेलखंड त्योहारों का क्षेत्र माना जाता है, यहां पर छोटे-बड़े सभी त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं। होली का त्योहार जो पूरे देश ही नहीं अन्य देशों में जहां भारतीय संख्या अधिक है मनाया जाता है। ऐतिहासिक रूप से होली का उद्गम स्थल बुंदेलखंड की धरा ही है। बुंदेलखंड के एरच धाम जो कभी हिरण्यकश्यप की राजधानी रही है, पुराने समय में इसका नाम एरिकेच्छ था, बाद में बदलकर इसका नाम एरज हो गया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार होलिका ने यहीं पर भक्त प्रहलाद को गोद में बैठाकर जलाने की कोशिश की थी। प्रहलाद के बचने पर लोगों ने धूल उड़ाकर खुशी मनाई थी, इसलिए इसे होली के त्योहार को बुंदेलखंड में धुलेड़ी के नाम से भी जाना जाता है।
होलिका के जलने और भक्त प्रहलाद के बचने के बाद लोगों ने धूल की होली खेलकर खुशी जाहिर की थी। तभी से यह परंपरा ललितपुर जिले में कायम है। दहन के बाद लोग पूरी आस्था से होलिका की पूजा व परिक्रमा करते हैं। इसके बाद उत्साही युवा रात से ही कीचड़ और धूल की होली खेलना शुरू कर देते हैं। प्रतिपदा (परमा) में पूरे दिन कीचड़, गोबर और धूल की होली चलती है। इसके पीछे मान्यता है कि किसानों की फसल पक जाने और घर आने की खुशी वह इस तरह मनाते हैं। कीचड़ और गोबर की होली में भी बुंदेलों में सौहार्द व प्रेम झलकता है। इसके बाद भाईदूज को सभी सुबह से ही रंग-गुलाल की होली खेलते हैं। धुलेड़ी केे पीछे एक मान्यता है यह भी है कि जब भक्त प्रह्लाद को उसकी बुआ होलिका ने गोदी में बैठाकर आग से जलाकर भस्म करने का प्रयास किया, तो भक्त प्रह्लाद तो बच गए, लेकिन होलिका आग में जल गई। विष्णु उपासकों और देवताओं ने भक्त प्रह्लाद के बचने की खुशी में उत्सव मनाया और होलिका दहन की भस्म को माथे व पूरे शरीर पर लगाया। धीरे-धीरे परम्परा ने जन्म ले लिया और होलिका दहन की भस्म को जल में मिश्रित करके धारण किया जाने लगा। जिसको भस्म नहीं मिल पाई, उसने होलिका दहन स्थल की धूल को ही जल में मिश्रित कर माथे से लगा लिया। बाद में यह नालों के कीचड़ में बदल गया, जो एक कुरीति के रूप में ऩजर आने लगा।
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आटे की लोई को पूरे शरीर में फेरकर होलिका की अग्नि दहन की है परंपरा
बुंदेलखंड में यह भी परंपरा है कि आटे की गोली (लोई) को घर के बच्चों पूरे शरीर पर फेरा जाता है। इसके बाद इस आटे की लोई को होलिका स्थल से घर लाई गई आग में दहन कर दिया जाता है। मान्यता है कि इससे शरीर को संक्रमण जनित रोगों से छुटकारा मिल जाता है।
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