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Lalitpur News: ललितपुर के सैंड स्टोन से बनी है ओमान की मस्जिद
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ललितपुर। जिले के सैंड स्टोन की विदेश तक पहचान थी। यहां के पत्थर से ओमान की राजधानी मस्कट में सुल्तान कबूस मस्जिद का निर्माण हुआ है। इसके लिए जिले से तीन लाख टन पत्थर भेजा गया था। विश्व की खूबसूरत मस्जिद में शुमार यह 4.16 लाख वर्गमीटर में निर्मित है। लेकिन यहां की खदानें बंद होने से जिले की पत्थर की पहचान अब समाप्त हो गई है।
जिले में मेलो व सन मेलो सैंड स्टोन पाया जाता है। यह पत्थर तापरोधी होने के कारण राजस्थान, गुजरात व महाराष्ट्र में इसकी विशेष मांग रही है। साउथ अफ्रीका की ओर भी इस पत्थर ने अपनी पहचान बना ली थी। ओमान की राजधानी मस्कट में बनी वहां की सबसे बड़ी मस्जिद के निर्माण में भी इस पत्थर का इस्तेमाल किया गया। दिसंबर 1994 से मई 2001 के बीच तैयार की गई इस मस्जिद के लिए जिले से तीन लाख टन सैंड स्टोन भेजा गया। जिले का सैंड स्टोन उच्च गुणवत्ता के साथ रंग एवं अपनी मजबूती के कारण जाना जाता है। लेकिन, पर्यावरण विभाग की आपत्ति के बाद बंद हुए खदानों के कारण जनपद से व्यापार समाप्त हो गया है।
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छह वर्ष पूर्व इस कारोबार पर लगा ग्रहण
सिर्फ धौर्रा-जाखलौन क्षेत्र में ही 47 खदानों का संचालन होता था। इसके अलावा मदनपुर, बालाबेहट व मड़ावरा क्षेत्र में भी खदानें थीं। लेकिन, वित्तीय वर्ष 2018-19 में धौर्रा-जाखलौन क्षेत्र की खदानों को पर्यावरण विभाग की आपत्ति के बाद बंद कर दिया गया। महावीर वन्य जीव बिहार देवगढ़ ने पर्यावरण मंत्रालय को रिपोर्ट भेजी थी, जिसमें दस किलोमीटर के दायरे में किसी प्रकार के खनन पर रोक लगाने की सिफारिश की गई थी। पर्यावरण विभाग ने वनक्षेत्र के दस किलोमीटर दायरे में संचालित सभी खदानों पर रोकने के आदेश जारी किए। इसके बाद यहां पर संचालित 47 खदानों को बंद कर दिया गया। वन विभाग की सीमा तय होने के बाद कुछ खदानों को प्रारंभ किया गया। वर्तमान में 14 खदानें चल रही हैं। जाखलौन में 11 व तीन अन्य क्षेत्रों में ये खदानें हैं।
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जिले के पत्थर से ओमान की सबसे बड़ी सुल्तान कबूस मस्जिद तैयार हुई है। लेकिन, पर्यावरण विभाग की आपत्ति के बाद करीब 47 खदानों को बंद किया गया, जिसमें अधिकांश धौर्रा-जाखलौन क्षेत्र की थीं। वर्तमान में वन विभाग की सीमाओं को चिह्नित करते हुए कुल 11 खदानें चल रही हैं।-अमितोष वर्मा, जिला खनन अधिकारी।
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जिले में मेलो व सन मेलो सैंड स्टोन पाया जाता है। यह पत्थर तापरोधी होने के कारण राजस्थान, गुजरात व महाराष्ट्र में इसकी विशेष मांग रही है। साउथ अफ्रीका की ओर भी इस पत्थर ने अपनी पहचान बना ली थी। ओमान की राजधानी मस्कट में बनी वहां की सबसे बड़ी मस्जिद के निर्माण में भी इस पत्थर का इस्तेमाल किया गया। दिसंबर 1994 से मई 2001 के बीच तैयार की गई इस मस्जिद के लिए जिले से तीन लाख टन सैंड स्टोन भेजा गया। जिले का सैंड स्टोन उच्च गुणवत्ता के साथ रंग एवं अपनी मजबूती के कारण जाना जाता है। लेकिन, पर्यावरण विभाग की आपत्ति के बाद बंद हुए खदानों के कारण जनपद से व्यापार समाप्त हो गया है।
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छह वर्ष पूर्व इस कारोबार पर लगा ग्रहण
सिर्फ धौर्रा-जाखलौन क्षेत्र में ही 47 खदानों का संचालन होता था। इसके अलावा मदनपुर, बालाबेहट व मड़ावरा क्षेत्र में भी खदानें थीं। लेकिन, वित्तीय वर्ष 2018-19 में धौर्रा-जाखलौन क्षेत्र की खदानों को पर्यावरण विभाग की आपत्ति के बाद बंद कर दिया गया। महावीर वन्य जीव बिहार देवगढ़ ने पर्यावरण मंत्रालय को रिपोर्ट भेजी थी, जिसमें दस किलोमीटर के दायरे में किसी प्रकार के खनन पर रोक लगाने की सिफारिश की गई थी। पर्यावरण विभाग ने वनक्षेत्र के दस किलोमीटर दायरे में संचालित सभी खदानों पर रोकने के आदेश जारी किए। इसके बाद यहां पर संचालित 47 खदानों को बंद कर दिया गया। वन विभाग की सीमा तय होने के बाद कुछ खदानों को प्रारंभ किया गया। वर्तमान में 14 खदानें चल रही हैं। जाखलौन में 11 व तीन अन्य क्षेत्रों में ये खदानें हैं।
जिले के पत्थर से ओमान की सबसे बड़ी सुल्तान कबूस मस्जिद तैयार हुई है। लेकिन, पर्यावरण विभाग की आपत्ति के बाद करीब 47 खदानों को बंद किया गया, जिसमें अधिकांश धौर्रा-जाखलौन क्षेत्र की थीं। वर्तमान में वन विभाग की सीमाओं को चिह्नित करते हुए कुल 11 खदानें चल रही हैं।-अमितोष वर्मा, जिला खनन अधिकारी।