जादू-टोना के चक्कर में बच्चों का बेरहमी से कत्ल करने वाले को मिली ‘सबसे बड़ी सजा’
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कानपुर सरसैया घाट स्थित जनाना घाट के पास बनी झुग्गी झोपड़ी (बिहारी लाइन) में मूलरूप से मुंगेर बिहार के लव्वा गिरी निवासी टिंकू पाल पत्नी हीरा, बेटे गोलू, साहिल, कार्तिक और बेटी आरती के साथ रहता था। टिंकू और हीरा कबाड़ बीनते थे। टिंकू के पड़ोस में मुंगेर जमालपुर निवासी रिक्शा चालक राजेश माझी रहता था। टिंकू ने राजेश के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इसमें कहा गया था कि 28 अगस्त 2013 को राजेश का दस साल का बेटा शिवम बीमारी से मर गया था। राजेश को शंका थी कि टिंकू पाल ने जादू-टोना करवा कर उसे मरवा दिया है।
इसलिए वह बदला लेने की फिराक में रहता था। 29 अगस्त 2013 को सुबह आठ बजे राजेश ने घर के बाहर खेल रहे टिंकू पाल के सात साल के बेटे साहिल को पकड़ लिया। उसने साहिल को जमीन पर पटका और छाती पर पैर रखने के बाद चाकू से उसका गला रेत कर मार डाला। इसके बाद साहिल के छोटे भाई पांच साल के कार्तिक को भी उसी तरह गला रेतकर मार दिया। इसके बाद टिंकू पाल के तीसरे बेटे दस साल के गोलू को भी पीटने लगा।
उसे भी मारने की फिराक में था लेकिन तब तक भीड़ ने उसे घेर लिया तो वह सबको चाकू मारने की धमकी देने लगा। सूचना मिलने पर पहुंची पुलिस ने उसे चाकूसमेत गिरफ्तार किया था। सहायक शासकीय अधिवक्ता राजेश्वर तिवारी ने बताया कि घटना के समय कार्तिक खाना खा रहा था। पोस्टमार्टम में उसके पेट में वही खाना निकला। खाना पचा तक नहीं था। यह दोहरी हत्या का विरलतम मामला था। इसलिए उन्होंने कोर्ट से मृत्यु दंड की मांग की थी। कोर्ट ने राजेश माझी को फांसी की सजा सुनाई है।
कोर्ट ने फैसले में की कड़ी टिप्पणी
कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाते हुए कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने 55 पेज के फैसले में कहा है कि अभियुक्त द्वारा पूरे समाज के लिए खतरा पैदा किया गया है। जैसा कि साक्ष्य में आया है कि यदि वादी का तीसरा पुत्र थोड़ा बड़ा होने के कारण शोर मचाकर न भागता तो अभियुक्त की पाशविकता का शिकार हो सकता था।
साक्ष्य में आया है कि घटना के समय आसपास भय का वातावरण बन गया था। लोगों ने घरों के दरवाजे बंद कर लिए थे। इस तरह से अभियुक्त वादी के शेष बचे परिवार और समाज के लिए खतरा है। अभियुक्त ने अत्यंत क्रूर और राक्षसी परिस्थितियों में वीभत्स तरीके से एक के बाद एक दोनों अबोध बच्चों की चाकू से गला काटकर निर्मम और जघन्य हत्या की है। यह कृत्य विरल से विरलतम की श्रेणी में आता है। मृत्यु दंड केअतिरिक्त अन्य कोई वैकल्पिक परिस्थिति प्रकट नहीं होती है।
जज ने तोड़ दी पेन की नोंक
एडीजे 3 ने फैसले में कहा है कि अभियुक्त की गर्दन में फांसी लगाकर तब तक लटकाया जाए तब तक मृत्य न हो जाए। इसके बाद एडीजे 3 ने पेन की नोंक तोड़ दी।
पुष्टि के लिए हाईकोर्ट जाएगा आदेश
एडीजे 3 ने फांसी की सजा को पुष्टि के लिए हाईकोर्ट भेजा है। किसी भी निचली कोर्ट के फांसी की सजा सुनाने के बाद आदेश को पुष्टि के लिए नियमानुसार हाईकोर्ट भेजा जाता है।
शासकीय अधिवक्ता की दो रूलिंग अहम
सहायक शासकीय अधिवक्ता राजेश्वर तिवारी ने इस मामले में फांसी की मांग करते हुए दो रूलिंग एडीजे 3 की कोर्ट के सामने रखी थी। पहली रूलिंग 2015 सुप्रीम कोर्ट केसेज क्रिमिनल बंसता संपत दोपटे बनाम महाराष्ट्र राज्य की रखी गई थी। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने चार साल की बच्ची के साथ रेप कर मर्डर में तीन जस्टिस की कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई थी। शासकीय अधिवक्ता ने कोर्ट में कहा कि दो मासूमों की दिन दहाड़े हत्या इस केस भी विरलतम है।
शासकीय अधिवक्ता ने दूसरी रूलिंग 2003 सुप्रीम कोर्ट केसेज क्रिमिनल ओम प्रकाश उर्फ राजा बनाम उत्तरांचल राज्य की रखी थी। इसमें दो जस्टिस की बेंच ने घर के नौकर को तीन लोगों की हत्या में फांसी की सजा सुनाई थी। शासकीय अधिवक्ता ने कोर्ट में कहा कि दो मासूम की हत्या के बाद तीसरे की हत्या का प्रयास किया गया। दोनों रूलिंग फैसले में अहम मानी गईं।
बड़े भाई ने कोर्ट में बताया था आंखों देखा हाल
घटना के समय 10 साल की उम्र वाले गोलू ने कोर्ट में पूरा आंखों देखा हाल सुनाया था। उसने कोर्ट में पूरे एक्शन के साथ हत्या करने का सीन बताया था। उसने बताया था कि उसके दोनों भाइयों को बारी-बारी से जमीन पर पटक कर उनका गला रेत दिया था।
मां-बाप बोले, हाईकोर्ट तक लड़ेंगे केस
टिंकू पाल और उसकी पत्नी ने बेटों के हत्यारे को फांसी की सजा देने पर संतोष जताया। दोनों ने कहा कि ऐसे हत्यारे को फांसी ही मिलनी चाहिए थी। अब अगर राजेश माझी ने इस फैसले के खिलाफ अपील की तो वह लोग भी हाईकोर्ट तक पूरा मामला लड़ेंगे।
फतेहगढ़ सेंट्रल जेल में होती फांसी
कानपुर और कानपुर देहात में फांसीघर नहीं है। यहां फांसी की सजा पाने वाले को फतेहगढ़ सेंट्रल जेल फांसीघर भेजने का नियम है। जेल अफसरों के मुताबिक प्रदेश में कई सालों से किसी को फांसी नहीं हुई। इस समय प्रदेश में दो जल्लाद हैं। एक मेरठ सेंट्रल जेल और दूसरा लखनऊ मॉडल जेल में है। इन दोनों को पांच-पांच हजार रुपये महीना मानदेय मिलता है। यह जेल कर्मचारी नहीं होते हैं।
13 साल पहले सुनाई गई थी फांसी
बार एसोसिएशन के महामंत्री योगेंद्र अवस्थी ने बताया कि शहर में 13 साल बाद किसी को फांसी की सजा सुनाई गई है। इससे पहले डीएवी के महामंत्री रहे रामबाग निवासी चक्रेश अवस्थी और उनके साथी आशू निगम की हत्या में जिला जज कोर्ट ने छह जनवरी 2004 को अभियुक्तों को दोष साबित होने पर फांसी की सजा सुनाई थी। चक्रेश अवस्थी के भाई एडवोकेट मनीष अवस्थी ने बताया कि 30 अक्तूबर 2001 को चक्रेश अवस्थी की हत्या की गई थी।
छह जनवरी 2004 को जिला जज कोर्ट ने हत्या का दोष साबित होने पर अशोक सिंह भदौरिया, अजीत सिंह भदौरिया, राजेश भदौरिया (तीनों भाई) और उनके नौकर बउआ पांडेय को फांसी की सजा सुनाई थी। इस आदेश के खिलाफ ये लोग अपील पर हाईकोर्ट चले गए थे। वहां से फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया था। फिर हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई। सुप्रीम कोर्ट ने इस हत्याकांड को विरल से विरलतम नहीं माना था और हाईकोर्ट के आजीवन कारावास के फैसले को बरकरार रखा था।