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हिंदी भाषा के विकास से ही राष्ट्र का विकास संभव
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हिन्दी हैं हम कार्यक्रम में मौजूद साहित्यकार
- फोटो : ORAI
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उरई। अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से ‘हिंदी हैं हम’ विषय पर विचार गोष्ठी आयोजित की गई। जिसमें संवेदना साहित्य समिति से जुड़े साहित्यकारों ने ‘हिंदी भाषा के महत्व व उसके उत्थान’ पर चर्चा की। गोष्ठी की अध्यक्षता साहित्यकार यज्ञदत्त त्रिपाठी ने और संचालन संस्था की अध्यक्ष माया सिंह ने की। इसमें वक्ताओं ने कहा कि हिंदी सिर्फ भाषा ही नहीं बल्कि हमारी संस्कृति, व्यक्तित्व और पहचान का प्रतीक है। हिंदी भाषा के विकास से ही राष्ट्र का विकास संभव है।
समिति के राजेंद्र नगर स्थित कार्यालय में आयोजित गोष्ठी में यज्ञ त्रिपाठी ने कहा कि संस्कृत भाषा का सरलीकरण ही हिंदी भाषा है। इसे अधिक से अधिक अपनाकर भाषा के प्रयोग को बढ़ाया जा सकता है। वरिष्ठ साहित्यकार प्रेम नारायण दीक्षित ने कहा कि कई भाषाओं का हिंदी में समावेश बेहद सुंदर ढंग से हुआ है। हमें हिंदी भाषा का प्रयोग करने में हिचक नहीं बल्कि गौरव महसूस करना चाहिए। रामशंकर गौर ने हिंदी के महत्व और स्वरूप पर बेहद प्रभावशाली काव्य रचना प्रस्तुत करते हुए कहा कि भले ही अंग्रेजी का प्रचलन बढ़ा हो लेकिन हिंदी भाषा की अपनी ही विश्वस्तरीय पहचान है, जिस पर हम सभी को गर्व है।
इसी कड़ी में साहित्यकार सिद्धार्थ त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी भाषा को आगे बढ़ाने की सबसे अधिक जिम्मेदारी हम साहित्यकारों की ही है। वहीं, अरुण प्रताप सिंह ने हिंदी की उन्नति और विकास के लिए बड़े स्तर पर नीति बनाए जाने पर बल दिया। इस अवसर पर बालगढ़ इंटर कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य जगरूप सिंह ने कहा कि यह हिंदी का बढ़ता प्रभाव ही है कि अब कई पाठ्यक्रम जो कुछ सालों पूर्व तक सिर्फ अंग्रेजी भाषा से ही हुआ करते थे, वे भी अब हिंदी भाषा में संभव हो रहे हैं।
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साहित्यकार संजय शर्मा ने कहा कि भाषा के प्रोत्साहन के लिए सरकारी व प्राइवेट कार्यालयों में सभी विभागीय कार्य व बैठकों में हिंदी का ही प्रयोग किया जाना चाहिए। साहित्यकार सुरेशचंद्र त्रिपाठी ने हिंदी के महत्व को रेखांकित किया। आखिर में संस्था की ओर से माया सिंह ने ‘संस्कृत के हिमगिरि से निकली हिंदी पावन गंगा है, हिंदी जन मन गण का स्वर है, हिंदी अजेय तिरंगा है’ पंक्तियां सुनाकर भाव विभोर किया।
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समिति के राजेंद्र नगर स्थित कार्यालय में आयोजित गोष्ठी में यज्ञ त्रिपाठी ने कहा कि संस्कृत भाषा का सरलीकरण ही हिंदी भाषा है। इसे अधिक से अधिक अपनाकर भाषा के प्रयोग को बढ़ाया जा सकता है। वरिष्ठ साहित्यकार प्रेम नारायण दीक्षित ने कहा कि कई भाषाओं का हिंदी में समावेश बेहद सुंदर ढंग से हुआ है। हमें हिंदी भाषा का प्रयोग करने में हिचक नहीं बल्कि गौरव महसूस करना चाहिए। रामशंकर गौर ने हिंदी के महत्व और स्वरूप पर बेहद प्रभावशाली काव्य रचना प्रस्तुत करते हुए कहा कि भले ही अंग्रेजी का प्रचलन बढ़ा हो लेकिन हिंदी भाषा की अपनी ही विश्वस्तरीय पहचान है, जिस पर हम सभी को गर्व है।
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इसी कड़ी में साहित्यकार सिद्धार्थ त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी भाषा को आगे बढ़ाने की सबसे अधिक जिम्मेदारी हम साहित्यकारों की ही है। वहीं, अरुण प्रताप सिंह ने हिंदी की उन्नति और विकास के लिए बड़े स्तर पर नीति बनाए जाने पर बल दिया। इस अवसर पर बालगढ़ इंटर कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य जगरूप सिंह ने कहा कि यह हिंदी का बढ़ता प्रभाव ही है कि अब कई पाठ्यक्रम जो कुछ सालों पूर्व तक सिर्फ अंग्रेजी भाषा से ही हुआ करते थे, वे भी अब हिंदी भाषा में संभव हो रहे हैं।
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साहित्यकार संजय शर्मा ने कहा कि भाषा के प्रोत्साहन के लिए सरकारी व प्राइवेट कार्यालयों में सभी विभागीय कार्य व बैठकों में हिंदी का ही प्रयोग किया जाना चाहिए। साहित्यकार सुरेशचंद्र त्रिपाठी ने हिंदी के महत्व को रेखांकित किया। आखिर में संस्था की ओर से माया सिंह ने ‘संस्कृत के हिमगिरि से निकली हिंदी पावन गंगा है, हिंदी जन मन गण का स्वर है, हिंदी अजेय तिरंगा है’ पंक्तियां सुनाकर भाव विभोर किया।