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यूक्रेन से लौटने के बाद ननिहाल पहुंचे उत्कर्ष
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यूक्रेन से लौटे उत्कर्ष को आशीर्वाद देते नाना नानी व मामा।
- फोटो : ORAI
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उरई। एक छात्र और रविवार को यूक्रेन से लौट आया। ननिहाल पहुंचने पर उसका स्वागत किया गया। यूक्रेन से लौटे उत्कर्ष चौबे ने बताया कि यूक्रेन में इस वक्त जो स्थिति है, उसका सही आकलन नहीं हो रहा है। रोजाना बमबारी से वहां पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं में दहशत है। हालांकि उत्कर्ष ने भारत सरकार के प्रयासों की सराहना की है।
उत्कर्ष चौबे ललितपुर के रहने वाले हैं। उनके पिता दीपक चौबे डॉक्टर है। मां रिचा उरई के रामनगर स्थित मायके में रहती हैं। यूक्रेन से दिल्ली तक फ्लाइट से आए। दिल्ली से यूपी भवन की तरफ से मुहैया कराई गई कार से वह उरई आए। उनके साथ फिरोजाबाद, इटावा, चित्रकूट जिले के चार और छात्र थे। पहले उनकी कार चित्रकूट जा रही थी। जैसे ही ननिहाल के लोगों को इसकी जानकारी हुई, तो नाना भगवानदास शुक्ला, नानी कमल शुक्ला, भगवती शरण शुक्ला, मामा अमित शुक्ला, सौरभ दुबे, रोहित गौतम ने कार को उरई में ही रोक लिया।
उत्कर्ष ने बताया कि वह यूक्रेन में एमबीबीएस की छठवें वर्ष की पढ़ाई कर रहा है। युद्ध को लेकर यूक्रेन में कोई तैयारी नहीं थी। उनके बस पकड़ने तक वहां पर क्लास चल रही थी। हालांकि यूक्रेन में पढ़ने वाले दूसरे देशों के लोग भयभीत थे। वह किसी तरह यूक्रेन से निकलना चाह रहे थे। भारतीय दूतावास से संपर्क करने में दिक्कत हो रही थी। किसी तरह वह हंगरी दूतावास की मदद से बार्डर तक आ गए। उन्होंने बताया कि तिरंगा झंडा रखने वालों को सहूलियत मिल रही थी। उन्हें खाने, रहने में दिक्कत नहीं हुई। वह स्वीकार करते हैं कि भारत में आरक्षण व्यवस्था के चलते कई बार यहां के युवकों को विदेश जाकर पढ़ाई करने को मजबूर होना पड़ता है।
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उत्कर्ष चौबे ललितपुर के रहने वाले हैं। उनके पिता दीपक चौबे डॉक्टर है। मां रिचा उरई के रामनगर स्थित मायके में रहती हैं। यूक्रेन से दिल्ली तक फ्लाइट से आए। दिल्ली से यूपी भवन की तरफ से मुहैया कराई गई कार से वह उरई आए। उनके साथ फिरोजाबाद, इटावा, चित्रकूट जिले के चार और छात्र थे। पहले उनकी कार चित्रकूट जा रही थी। जैसे ही ननिहाल के लोगों को इसकी जानकारी हुई, तो नाना भगवानदास शुक्ला, नानी कमल शुक्ला, भगवती शरण शुक्ला, मामा अमित शुक्ला, सौरभ दुबे, रोहित गौतम ने कार को उरई में ही रोक लिया।
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उत्कर्ष ने बताया कि वह यूक्रेन में एमबीबीएस की छठवें वर्ष की पढ़ाई कर रहा है। युद्ध को लेकर यूक्रेन में कोई तैयारी नहीं थी। उनके बस पकड़ने तक वहां पर क्लास चल रही थी। हालांकि यूक्रेन में पढ़ने वाले दूसरे देशों के लोग भयभीत थे। वह किसी तरह यूक्रेन से निकलना चाह रहे थे। भारतीय दूतावास से संपर्क करने में दिक्कत हो रही थी। किसी तरह वह हंगरी दूतावास की मदद से बार्डर तक आ गए। उन्होंने बताया कि तिरंगा झंडा रखने वालों को सहूलियत मिल रही थी। उन्हें खाने, रहने में दिक्कत नहीं हुई। वह स्वीकार करते हैं कि भारत में आरक्षण व्यवस्था के चलते कई बार यहां के युवकों को विदेश जाकर पढ़ाई करने को मजबूर होना पड़ता है।
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