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गोस्वामी तुलसी दास की जन्मस्थली उपेक्षा की शिकार

Mon, 11 Nov 2019 11:09 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Mon, 11 Nov 2019 11:09 PM IST
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Goswami Tulsi Das's birthplace victim of neglect
गोंडा में परसपुर सूकरखेत में स्थित तुलसी मंदिर का जीर्णोधार के प्रदर्शन करते चौरासी कोसी परिक्र - फोटो : GONDA
परसपुर (गोंडा)। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की मर्यादा को जन-जन तक पहुंचाने वाले गोस्वामी तुलसीदास जी की जन्मस्थली की उपेक्षा का दंश अब लोगों से सहन नहीं होता। राम जन्मभूमि पर आए न्यायालय के फैसले से हर कोई गदगद है और सौहार्द कायम रखते हुए फैसले का स्वागत किया है। वहीं रामचरित मानस के अमर रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म स्थान उपेक्षा का शिकार है। सूकरखेत स्थित तुलसी घाट व सरोवर बदहाल हो चुके हैं।
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अवध धाम (अयोध्या) के चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग के सांस्कृतिक एवं शास्त्रीय सीमा में अवस्थित श्रीरामचरित मानस महाकाव्य के अमर प्रणेता विश्ववंद्य गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज के जन्म स्थान को लेकर चाहे जितने भी दावे क्यों न किये जा रहे हों। लेकिन सभी में जनपद गोंडा का दावा अपने आप मे पुख्ता साक्ष्यों पर आधारित है। कलकल करती पतित पावनी मां सरयू की धारा, सूकरखेत के पास राजापुर नामक गांव को गोस्वामी जी का जन्मस्थान माना जाता है। यहां पर राष्ट्रीय संत मोरारी बापू ने नव दिवसीय रामकथा सुनाकर अपने आप को धन्य किया था।
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गोस्वामी जी के जन्मस्थान से अयोध्या मात्र 60 किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है। प्रत्येक वर्ष यहां चैत्र मास में 84 कोसी परिक्रमा के लिए संत आते हैं। बताया जाता है कि चौरासी कोसी परिक्रमा करने से चौरासी लाख योनियों के भव-बंधन से जीव मुक्त हो जाता है। इस श्रद्धा एवं विश्वास के कारण ही धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अवध धाम की 84 कोसी परिक्रमा में दुलारे बाग, जम्बू दीप, गोस्वामी तुलसीदास जी की जन्म स्थली, पसका सूकरखेत स्थित भगवान वाराह की अवतार स्थली, गोस्वामी जी के गुरु नरहरिदास, बाराही देवी सहित अनेक धार्मिक स्थलों का भी साधु-संत व श्रद्धालु परिक्रमा कर अपने आप को कृतार्थ करते हैं। रामचरित मानस जैसे अमर महाकाव्य रचकर प्रभु राम का महिमा मंडन करने वाले गोस्वामी जी की जन्म स्थली आज भी उपेक्षित है।
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स्वयं तुलसीदास जी ने विनय पत्रिका में दिया है प्रमाण
परसपुर। अपने जन्म स्थान को लेकर गोस्वामी तुलसीदास जी ने खुद विनय पत्रिका में लिखा है। आलसी अभागे मोसे ते कृपालु पाले पोसे राजा मोरे राजाराम अवध सहरू। चूंकि जिस वक्त उन्होंने यह पंक्तियां लिखी थीं। उस वक्त गोंडा का कोई अस्तित्व नहीं था। तुलसी जन्मभूमि राजापुर से पांच किलोमीटर दक्षिण उनके गुरु नरहरिदास जी का आश्रम सूकरखेत में विद्यमान है। उन्होंने बताया कि गोस्वामी जी द्वारा रचित रामचरित मानस की पांडुलिपि का अवशेष आज भी उनके गुरु नरहरिदास जी के आश्रम पसका सूकरखेत में विद्यमान है।
राजस्व अभिलेख में आज भी दर्ज है गोचर भूमि
परसपुर। तुलसी जन्म भूमि सूकरखेत विकास समिति एवं सनातन धर्म परिषद के अध्यक्ष डॉ. स्वामी भगवदाचार्य ने बताया कि अयोध्या से सटे गोंडा के राजापुर सूकरखेत में गोस्वामी तुलसीदास के पिता आत्माराम के नाम का एक टेपरा (गोचर भूमि) जो आत्माराम टेपरा के नाम से सैकड़ों वर्षों से राजस्व अभिलेखों में दर्ज है। जो यहां तुलसी के पूर्वजों के रहने का स्वत: सिद्ध प्रमाण है। उन्होंने बताया कि गोस्वामी जी ने मानस में लिखा है मैं पुनि निज गुरु सन सुनी कथा सो सूकरखेत। उन्होंने बाल्यकाल में यह कथा गुरु नरहरिदास से सुनी थी। गोस्वामी जी ने गोंडा, फैजाबाद की अवधी भाषा का प्रयोग किया है। यहां की लोक संस्कृति को उन्होंने सूक्ष्मता पूर्वक चित्रित किया है। उनकी एक रचना रामलला नहछू लिखी थी।् नहछू नामक प्रथा केवल इसी क्षेत्र में प्रचलित है। आज भी उसी भाषा और तर्ज के नहछू (सोहर) इस क्षेत्र में गाये जाते हैं।
अब तुलसी के धाम का भी होना चाहिए विकास
परसपुर। तुलसी जन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष डॉ. स्वामी भगवदाचार्य के मुताबिक रामचरित मानस अमर महाकाव्य में मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु राम को महिमा मंडन करने वाले अयोध्या से सटे गोस्वामी जी की जन्मस्थली राजापुर सूकरखेत आज भी उपेक्षित है। तुलसी थियेटर के सामने लोग अपने जानवरों को बांधते है। देख-रेख के अभाव में तुलसी भवन जर्जर हो गया है। तुलसी घाट व तुलसी सरोवर देख रेख के अभाव में एक बड़े तालाब का रूप ले चुका है। सरयू घाघरा के पवित्र संगम स्थल त्रिमुहानी घाट को जाने वाला मार्ग उपेक्षित है।

उन्होंने बताया कि तुलसी के जन्म के विकास में सरकार और प्रशासन ने कोई रुचि नहीं ली। उन्होंने मांग करते हुये कहा कि तुलसी दास जी राष्ट्र के गौरव हैं। अब शासन, प्रशासन इस ऐतिहासिक, धार्मिक जन्मस्थली को विकसित करे। जैसा कि 2018 में सरकार ने अयोध्या की 84 कोसी परिक्रमा में आने वाले सभी दर्शनीय व आध्यात्मिक स्थलों को विकसित करने के लिए अयोध्या में शिलान्यास किया था।
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