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पीड़ा सुना कर फफक पड़े बाढ़ पीड़ित
Updated Tue, 05 Sep 2017 11:36 PM IST
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सुरेंद्र वत्स
रुद्रपुर। दोआबा के 52 गांवों मे 15 दिनों से बाढ़ की विभीषिका झेल रहे लोगों की पीड़ा दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। हालात बताने के दौरान उनकी आंखें नम हो जा रही हैं। वर्षों से आपदा झेलने को अभिशप्त दोआबा और कछार के लोगों के लिए राप्ती और गोर्रा नदी शोक साबित हो रही है। चंद दिनों के लिए मिलने वाले इमदाद और मदद के सहारे कितने दिन कटेंगे यह सोचकर वह चिंता में डूबे हैं।
जगदीशपुर गांव की बाढ़ पीड़ित बिफाई देवी की आंखें डबडबा गईं। उन्होंने कहा कि दोआबा के लोग जीवन की सबसे विनाशकारी आपदा झेल रहे हैं। उनका सब कुछ तबाह हो चुका है। पानी में डूबे घर मकान पस्त होते जा रहे हैं। इमदाद के भरोसे जिंदगी कब तक कटेगी। प्रशासन की पूड़ी-सब्जी सीमित स्थानों तक ही पहुंच पा रही है। गांव में बच्चे लाई भूजा खाकर 15 दिनों से जिंदा हैं। बिसाथी देवी ने कहा कि बबुआ कछार के लोगों को नदी कभी चैन की सांस नहीं लेने दे रही है। बाढ़ का कहर तीन पीढ़ी से झेल रहे हैं। उजड़ने और बसने में जिंदगी तबाह हो गई। इस बार की तबाही सबसे भयंकर हैं। सावरमती ने कहा कि बाढ़ पीड़ितों के भाग्य में सिर्फ मरना लिखा है। आपदा उनका पीछा नहीं छोड़ रही। कभी ओलावृष्टि, कभी सूखा और आग फसलों को बर्बाद कर देती तो हर दस से 20 साल पर बाढ़ पूरी तरह तबाह कर देती है। दोआबा के गरीब अभी 98 की बाढ़ से ही उबर नहीं पाए थे कि 2017 में फिर वज्रपात हो गया। रजावती देवी ने कहा कि दोआबा में आई बाढ़ से उबरना आसान नहीं है। भूखमरी और बीमारी से लोग दम तोड़ने लगे हैं। सरकारी सहायता के नाम पर कुछ भी नहीं मिला। बाढ़ पीड़ितों का जीवन खैरात पर टिका है।
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रुद्रपुर। दोआबा के 52 गांवों मे 15 दिनों से बाढ़ की विभीषिका झेल रहे लोगों की पीड़ा दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। हालात बताने के दौरान उनकी आंखें नम हो जा रही हैं। वर्षों से आपदा झेलने को अभिशप्त दोआबा और कछार के लोगों के लिए राप्ती और गोर्रा नदी शोक साबित हो रही है। चंद दिनों के लिए मिलने वाले इमदाद और मदद के सहारे कितने दिन कटेंगे यह सोचकर वह चिंता में डूबे हैं।
जगदीशपुर गांव की बाढ़ पीड़ित बिफाई देवी की आंखें डबडबा गईं। उन्होंने कहा कि दोआबा के लोग जीवन की सबसे विनाशकारी आपदा झेल रहे हैं। उनका सब कुछ तबाह हो चुका है। पानी में डूबे घर मकान पस्त होते जा रहे हैं। इमदाद के भरोसे जिंदगी कब तक कटेगी। प्रशासन की पूड़ी-सब्जी सीमित स्थानों तक ही पहुंच पा रही है। गांव में बच्चे लाई भूजा खाकर 15 दिनों से जिंदा हैं। बिसाथी देवी ने कहा कि बबुआ कछार के लोगों को नदी कभी चैन की सांस नहीं लेने दे रही है। बाढ़ का कहर तीन पीढ़ी से झेल रहे हैं। उजड़ने और बसने में जिंदगी तबाह हो गई। इस बार की तबाही सबसे भयंकर हैं। सावरमती ने कहा कि बाढ़ पीड़ितों के भाग्य में सिर्फ मरना लिखा है। आपदा उनका पीछा नहीं छोड़ रही। कभी ओलावृष्टि, कभी सूखा और आग फसलों को बर्बाद कर देती तो हर दस से 20 साल पर बाढ़ पूरी तरह तबाह कर देती है। दोआबा के गरीब अभी 98 की बाढ़ से ही उबर नहीं पाए थे कि 2017 में फिर वज्रपात हो गया। रजावती देवी ने कहा कि दोआबा में आई बाढ़ से उबरना आसान नहीं है। भूखमरी और बीमारी से लोग दम तोड़ने लगे हैं। सरकारी सहायता के नाम पर कुछ भी नहीं मिला। बाढ़ पीड़ितों का जीवन खैरात पर टिका है।
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