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Budaun News: आठ सौ में दे रहे 115 रुपये का ऑक्सीजन मास्क
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बदायूं। हालत गंभीर होने पर मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया..डॉक्टर ने अ़ॉक्सीजन लगाने के लिए मास्क मंगवाया। बाहर मेडिकल स्टोर पर पहुंचे को उसने ऑक्सीजन मास्क आठ सौ रुपये में दिया जबकि प्रिंट रेट सिर्फ 115 रुपये था। पूछा तो बोला-लेना हो तो लो वरना जाओ। मजबूरन लेना पड़ा। मेडिकल स्टोर वाले ने बिल भी भी नहीं दिया।
यह बानगी धनूपुरा के निवासी रामरूप शर्मा की ही नहीं बल्कि कई लोगों की है जिन्हें मरीज को जल्द राहत पहुंचाने के लिए मजबूरी में मेडिकल कॉलेज के बाहर से दवा और चिकित्सा उपकरण खरीदने पड़ते हैं। थोक बिक्री के लाइसेंस लेकर मेडिकल कॉलेज के सामने मेडिकल स्टोर फुटकर में दवाई बेच रहे हैं। यही मेडिकल स्टोर संचालक मनमाने दाम पर दवाई दे रहे हैं और बिल भी नहीं देते। इससे लाइसेंस की शर्त का उल्लंघन हो रहा है। इस मामले में औषधि विभाग के अधिकारी भी चुप हैं।
धनूपुरा के निवासी रामरूप शर्मा ने बताया कि सांस की दिक्कत होने पर बहनोई को मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया था। 4 मार्च को सुबह पांच बजे हालत बिगड़ने पर डॉक्टर ने ऑक्सीजन मॉक्स लाने को कहा। डॉक्टर ने कहा कि 115 रुपये प्रिंट रेट है। इससे ज्यादा न देना , लेकिन मेडिकल पर आठ सौ रुपये का मॉक्स दिया गया। इमरजेंसी थी, इसलिए लेना पड़ा। मेडीकल स्टोर संचालक ने इसका बिल भी नहीं दिया।
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क्या बोले तीमारदार
प्रिंट रेट से ज्यादा करना पड़ा भुगतान
मां मानसिक रोग से पीड़ित हैं । उनको मेडिकल कॉलेज में शुक्रवार को भर्ती कराया था। अंदर तो एक दवा दी गई बाकी की सभी दवाएं बाहर मेडिकल से ला रहे हैं। मेडिकल स्टोर पर बिल नहीं दे रहे हैं। प्रिंट रेट से भी ज्यादा दाम ले रहे हैं। -श्याम सुंदर, ललुआ नगला सहसवान
-मेडिकल स्टोर पर हो रही मनमानी
मेडिकल कॉलेज में दवा लेने आया हूं। डॉक्टर ने पर्चा पर दवा लिखी जिसको लेकर आया हूं। पांच गोली दी हैं जिसका चार सौ रुपये लिया है। बिल मांगने पर साफ मना कर दिया। - राजीव , दातागंज
-अक्सर बाहर से लेनी पड़ती हैं दवाइयां
पत्नी के सीने में दर्द रहता था। मेडिकल कॉलेज में इलाज चल रहा है। यहां हर बार बाहर से ही दवा लेते हैं। न तो बिल दिया जाता है न ही एक रुपये कम लिया जाता है। दवा पर छह गुना रुपये अधिक लिए जा रहे हैं। कुछ कहो तो मेडिकल संचालन झगड़े को तैयार रहते हैं।-कासिम, जुनावई
-रुपये कम होने पर दो दिन की ली दवा
-कासगंज से दवा लेने मेडिकल कॉलेज आए हैं। बताया था कि फ्री में दवा मिलती है तो पांच सौ रुपये और किराए का इंतजाम करके यहां आए। मेडिकल कॉलेज में दवा नहीं मिली तो बाहर से खरीदी। बिल दिया नहीं तो हम आगे कार्रवाई कैसे करें। - कुंती देवी, नगरिया, कासगंज
-अधिकांश दवाएं तो मेडिकल कॉलेज से ही मिलती है लेकिन कुछ दवा ऐसी होती है जिनको बाहर से ही लेना होता है। अगर आठ गुना रुपये अधिक लिए जा रहे हैं तो शिकायत करनी चाहिए। शिकायत मिलेगी तो डीएम और औषधि विभाग से कार्रवाई कराने को पत्राचार करेंगे। डॉ. एनसी प्रजापति, प्राचार्य, राजकीय मेडिकल कॉलेज बदायूं
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अभी दो दिन पहले ही बदायूं का चार्ज संभाला है। अधिक दाम लेने की कोई शिकायत नहीं मिली है। अगर दवा के साथ बिल नहीं दिए जा रहे हैं तो मेडिकल स्टोर का लाइसेंस निरस्त कराया जाएगा। अगर थोक के लाइसेंस पर रिटेल की जा रही तो भी कार्रवाई होगी।- लवकुश प्रसाद, औषधि निरीक्षक बदायूं।
-दिखाएं जागरूकता: बिल नहीं देने वाले मेडिकल स्टोर से न खरीदें दवा
जिस मेडिकल स्टोर पर बिल नहीं दिया जा रहा हो उस मेडिकल स्टोर से दवा नहीं खरीदना चाहिए। अगर दवा के दाम अधिक लिए जा रहे हैं तो उपभोक्ता फोरम में शिकायत का विकल्प है लेकिन इस विकल्प का इस्तेमाल तभी हो सकता है जब आपके पास साक्ष्य के तौर पर बिल हो। अगर दवा में कोई कमी होती है तो भी यही बिल उपभोक्ता के अधिकार की रक्षा करता है।- हरिश्चंद राजपूत, उपभोक्ता मामलों के अधिवक्ता
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यह बानगी धनूपुरा के निवासी रामरूप शर्मा की ही नहीं बल्कि कई लोगों की है जिन्हें मरीज को जल्द राहत पहुंचाने के लिए मजबूरी में मेडिकल कॉलेज के बाहर से दवा और चिकित्सा उपकरण खरीदने पड़ते हैं। थोक बिक्री के लाइसेंस लेकर मेडिकल कॉलेज के सामने मेडिकल स्टोर फुटकर में दवाई बेच रहे हैं। यही मेडिकल स्टोर संचालक मनमाने दाम पर दवाई दे रहे हैं और बिल भी नहीं देते। इससे लाइसेंस की शर्त का उल्लंघन हो रहा है। इस मामले में औषधि विभाग के अधिकारी भी चुप हैं।
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धनूपुरा के निवासी रामरूप शर्मा ने बताया कि सांस की दिक्कत होने पर बहनोई को मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया था। 4 मार्च को सुबह पांच बजे हालत बिगड़ने पर डॉक्टर ने ऑक्सीजन मॉक्स लाने को कहा। डॉक्टर ने कहा कि 115 रुपये प्रिंट रेट है। इससे ज्यादा न देना , लेकिन मेडिकल पर आठ सौ रुपये का मॉक्स दिया गया। इमरजेंसी थी, इसलिए लेना पड़ा। मेडीकल स्टोर संचालक ने इसका बिल भी नहीं दिया।
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क्या बोले तीमारदार
प्रिंट रेट से ज्यादा करना पड़ा भुगतान
मां मानसिक रोग से पीड़ित हैं । उनको मेडिकल कॉलेज में शुक्रवार को भर्ती कराया था। अंदर तो एक दवा दी गई बाकी की सभी दवाएं बाहर मेडिकल से ला रहे हैं। मेडिकल स्टोर पर बिल नहीं दे रहे हैं। प्रिंट रेट से भी ज्यादा दाम ले रहे हैं। -श्याम सुंदर, ललुआ नगला सहसवान
-मेडिकल स्टोर पर हो रही मनमानी
मेडिकल कॉलेज में दवा लेने आया हूं। डॉक्टर ने पर्चा पर दवा लिखी जिसको लेकर आया हूं। पांच गोली दी हैं जिसका चार सौ रुपये लिया है। बिल मांगने पर साफ मना कर दिया। - राजीव , दातागंज
-अक्सर बाहर से लेनी पड़ती हैं दवाइयां
पत्नी के सीने में दर्द रहता था। मेडिकल कॉलेज में इलाज चल रहा है। यहां हर बार बाहर से ही दवा लेते हैं। न तो बिल दिया जाता है न ही एक रुपये कम लिया जाता है। दवा पर छह गुना रुपये अधिक लिए जा रहे हैं। कुछ कहो तो मेडिकल संचालन झगड़े को तैयार रहते हैं।-कासिम, जुनावई
-रुपये कम होने पर दो दिन की ली दवा
-कासगंज से दवा लेने मेडिकल कॉलेज आए हैं। बताया था कि फ्री में दवा मिलती है तो पांच सौ रुपये और किराए का इंतजाम करके यहां आए। मेडिकल कॉलेज में दवा नहीं मिली तो बाहर से खरीदी। बिल दिया नहीं तो हम आगे कार्रवाई कैसे करें। - कुंती देवी, नगरिया, कासगंज
-अधिकांश दवाएं तो मेडिकल कॉलेज से ही मिलती है लेकिन कुछ दवा ऐसी होती है जिनको बाहर से ही लेना होता है। अगर आठ गुना रुपये अधिक लिए जा रहे हैं तो शिकायत करनी चाहिए। शिकायत मिलेगी तो डीएम और औषधि विभाग से कार्रवाई कराने को पत्राचार करेंगे। डॉ. एनसी प्रजापति, प्राचार्य, राजकीय मेडिकल कॉलेज बदायूं
अभी दो दिन पहले ही बदायूं का चार्ज संभाला है। अधिक दाम लेने की कोई शिकायत नहीं मिली है। अगर दवा के साथ बिल नहीं दिए जा रहे हैं तो मेडिकल स्टोर का लाइसेंस निरस्त कराया जाएगा। अगर थोक के लाइसेंस पर रिटेल की जा रही तो भी कार्रवाई होगी।- लवकुश प्रसाद, औषधि निरीक्षक बदायूं।
-दिखाएं जागरूकता: बिल नहीं देने वाले मेडिकल स्टोर से न खरीदें दवा
जिस मेडिकल स्टोर पर बिल नहीं दिया जा रहा हो उस मेडिकल स्टोर से दवा नहीं खरीदना चाहिए। अगर दवा के दाम अधिक लिए जा रहे हैं तो उपभोक्ता फोरम में शिकायत का विकल्प है लेकिन इस विकल्प का इस्तेमाल तभी हो सकता है जब आपके पास साक्ष्य के तौर पर बिल हो। अगर दवा में कोई कमी होती है तो भी यही बिल उपभोक्ता के अधिकार की रक्षा करता है।- हरिश्चंद राजपूत, उपभोक्ता मामलों के अधिवक्ता