चुनावी दंगल: सपा-बसपा के गढ़ में सियासी जमीन तलाश रहे चंद्रशेखर, फिर वही या नया 'मुकुट' चुनेगा नगीना
नगीना लोकसभा सीट पर इस बार चुनावी दंगल में जीत का राह किसी भी प्रत्याशी के लिए आसान नहीं दिख रही है। सपा-बसपा का गढ़ मानी जाने वाली इस सीट पर इस बार आजाद समाज पार्टी के मुखिया चंद्रशेखर भी मैदान में हैं।
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अब तक तीन बार नहटौर से विधायक चुने गए ओमकुमार के चुनावी दंगल का मैदान बदला हुआ है, दरअसल वह नगीना लोकसभा सीट से मैदान में हैं। उनकी जीत का क्रम जारी रहेगा या नए के सिर सेहरा बंधेगा...यह सवाल अभी समीकरणों में उलझा हुआ है। सपा और बसपा का गढ़ समझे जाने वाली इस सीट पर आसपा प्रमुख भी अपनी राजनैतिक सफर को शुरू करने की गुंजाइश तलाश रहे हैं।
नगीना के मतदाताओं ने अधिकतर बाहरी प्रत्याशी के साथ-साथ हर बार नई पार्टी व नए प्रत्याशी को ही गले लगाया है। अब तक हुए तीन चुनाव में दो बार बाहरी प्रत्याशी को यह सीट रास आई है, जबकि तीनों चुनाव में नगीना की जनता ने हर बार नई पार्टी के प्रत्याशी को जिताकर संसद में भेजा है। इस बार के चुनाव में भाजपा, सपा व बसपा के अलावा आजाद समाज पार्टी भी पहली बार चुनाव की मुख्य लड़ाई में कूदी है।
आजाद समाज पार्टी ने इस सीट पर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद को ही प्रत्याशी बनाकर उन पर ही दांव खेला है। जिससे यहां का चुनाव न केवल दिलचस्प बना हुआ है बल्कि यह सीट हॉट सीट भी बन गई है।
एक तरफ भाजपा प्रत्याशी ओम कुमार के लिए यह चुनाव उनकी प्रतिष्ठा का चुनाव है। विधायक होते हुए भी भाजपा हाईकमान द्वारा उन्हें लोकसभा का टिकट देने के बाद उनके सामने पार्टी की उम्मीदों पर खरा उतरने के साथ-साथ अपने राजनीतिक सफर के विजय रथ को बरकरार रखने की कड़ी चुनौती होगी।
दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी के लिए भी नगीना सीट बहुत अहम है। एक तरफ यह सीट उनकी जीती हुई सीट है जबकि उसकी इस सीट को राजनैतिक विरासत की सीट भी माना जाता है। क्योंकि बसपा सुप्रीमो मायावती ने 1989 में बिजनौर से जीतकर ही अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी, उस समय नगीना का क्षेत्र बिजनौर संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत ही आता था।
समाजवादी पार्टी के लिए भी नगीना सीट बहुत अहम है। वजह साफ है कि नगीना लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली पांच विधानसभा सीटों में से उसके तीन विधायक हैं। उसमें भी नगीना व नजीबाबाद सीट पर उसके विधायकों ने हाल ही में हुए 2022 के चुनाव में जीत की हैट्रिक लगाई थी।
कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के बाद समाजवादी पार्टी इस सीट पर अपनी मजबूत पकड़ मान रही है। भाजपा विपक्ष के वोटों के बिखराव की उम्मीद पर तथा विपक्षी पार्टियां दलित-मुस्लिम गठजोड़ के सहारे अपनी जीत की नैया पार लगाने का ख्वाब देख रही हैं।
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2019 के चुनाव में दलित- मुस्लिम गठजोड़ के चलते ही बसपा प्रत्याशी जीत दर्ज करने में कामयाब हुए थे। हालांकि इस बार सपा व बसपा अलग-अलग चुनावी मैदान में हैं। जिससे इस बार के चुनावी परिणाम क्या होंगे यह भविष्य के गर्भ में छुपा है।
नगीना लोकसभा सुरक्षित सीट को मुस्लिम-दलित बाहुल्य सीट माना जाता है। इस सीट पर मुस्लिम-दलित मतदाताओं का रुख ही परिणाम की दिशा तय करता है। इस बार के लोकसभा चुनाव में 16 लाख 38 हजार 329 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे।
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मुस्लिम और दलित मतदाता तय करते हैं चुनाव का रुख
माना जा रहा है कि इसमें करीब छह लाख मुस्लिम तथा करीब तीन लाख दलित मतदाता शामिल है। बसपा, सपा व आजाद समाज पार्टी तीनों पार्टियों के प्रत्याशियों की निगाह इन दोनों वोटरों को अपने पक्ष में लुभाने पर लगी है। हालांकि भाजपा भी मुस्लिम महिलाओं व दलित वोटों पर अपनी उम्मीद लगाए बैठी है।
हर पार्टी के लिए नगीना सीट कितनी अहम है, इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बसपा ने अपने चुनावी प्रचार अभियान की शुरुआत नगीना से ही करने का निर्णय लिया है।
आगामी छह अप्रैल को पार्टी सुप्रीमो मायावती के भतीजे आकाश आनंद नगीना में चुनावी जनसभा के साथ पार्टी के चुनावी अभियान की शुरुआत करेंगे। पार्टी के जिलाध्यक्ष दिलीप कुमार उर्फ पिंटू ने इस कार्यक्रम की पुष्टि की है।