{"_id":"59b5a5da4f1c1bf97f8b5d23","slug":"knife-careiry","type":"story","status":"publish","title_hn":"लाड़लों का कैरियर भी धारदार बनाया धार लगाने वाले ने","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
लाड़लों का कैरियर भी धारदार बनाया धार लगाने वाले ने
बरेली
Updated Mon, 11 Sep 2017 02:21 AM IST
विज्ञापन
कैची में ध्ाार लगाते कारीगर
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शहामतगंज की एक छोटी सी दुकान में उम्र भर शान पर सिर झुकाकर चाकू और कैंचियों पर धार रखने वाले अब्दुल राशिद अब सिर उठाकर चलते हैं। चाकू-कैंचियों पर धार रखने के हुनर का रंग उन्होंने पूरी शिद्दत से अपने एक बेटे और तीन बेटियों की जिंदगी में भी भरा है और उनका यह गर्व अपनी इसी उपलब्धि का है। आज उनकी तीन बेटियों में सबसे बड़ी डॉक्टर बनकर दिल्ली में अपने पति के साथ अस्पताल चला रही है, दो बेटियां एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही हैं और चार्टर्ड एकाउंटेंट बेटा जेद्दा में प्रैक्टिस कर रहा है। एक बेटी एलएलएम भी है।
मूल रूप से एटा के रहने वाले अब्दुल राशिद 1980 में रोजगार की तलाश में बरेली आए थे और ठिरिया में रहने वाले अपने ससुराल वालों की मदद से यहीं बस गए। शहामतगंज में एक किराये की दुकान में चाकू-कैंची में धार रखने का पुश्तैनी धंधा शुरू कर दिया। राशिद बताते हैं कि जब उनके बेटे और बेटियों ने होश भी नहीं संभाला था, तभी उन्होंने और उनकी पत्नी शाकिरा बेगम ने ठान लिया था कि अपने उन्हें तालीम दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। छोटी सी आमदनी में जीवनयापन की तमाम मुश्किलों के बावजूद उन्होंने अपने संकल्प को टूटने नहीं दिया।
राशिद बताते हैं कि सबसे पहले उनका बेटा सलीम सुल्तान अपने पैरों पर खड़ा हुआ। चौबारी के नवोदय विद्यालय से पढ़ाई पूरी करने के बाद बीकॉम ऑनर्स अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से किया। इसके बाद सलीम बदायूं में 15 हजार की प्राइवेट नौकरी करने लगे तो की तो राशिद कुछ सहारा मिल गया। इसी बीच बड़ी बेटी तबस्सुम ने दिल्ली की डीम्ड यूनिवर्सिटी जामिया हमदर्द से बीयूएमएस की प्रवेश परीक्षा पास कर ली। राशिद के सपनों को जैसे पंख लग गए। पढ़ाई के दौरान ही तबस्सुम की शादी हो गई। वह अब डॉक्टर पति के साथ दिल्ली में अपना अस्पताल चला रही हैं। दूसरे नंबर की बेटी अंजुम के एएमयू से एलएलएम करने के बाद राशिद ने उसकी शादी बुलंदशहर के एक कारोबारी से कर दी। इस बीच तीसरे नंबर की बेटी आरिफा का बरेली के एक मेडिकल कॉलेज में एडमिशन हो गया। वह एमबीबीएस की तीसरे साल की पढ़ाई कर रही है। सबसे छोटी राबिया भी नोएडा की शारदा यूनिवर्सिटी में मेडिकल की दूसरे वर्ष की छात्रा है।
विज्ञापन
शादी के लिए जुटाए पैसे भी पढ़ाई में लगा दिए
अब्दुल राशिद और उनकी पत्नी शाकिरा बेगम ने बड़ी बेटी तबस्सुम की शादी के लिए कुछ रकम इकट्ठी की थी, लेकिन जब उन्होंने तबस्सुम की पढ़ाई में दिलचस्पी देखी तो उस रकम को उसकी पढ़ाई पर ही खर्च कर दिया। बेटे सलीम ने बदायूं में प्राइवेट नौकरी करते हुए सीए बनने की ख्वाहिश जताई। उसे दिल्ली भेजा जहां उसने तैयारी करने के बाद सीए की पहले ग्रुप की परीक्षा पास की। सलीम ने सीए की पढ़ाई के बाद एमबीए भी किया। पिता अब्दुल राशिद ने घर के कागजों पर एजूकेशन लोन लेकर सलीम को एमबीए में दाखिला दिलाया। एमबीए के फौरन बाद उन्हें दुबई के जेद्दा में उन्हें चार्टर्ड एकाउंटेंट की नौकरी मिल गई।
अब बड़े बच्चों ने उठाई छोटों की पढ़ाई की जिम्मेदारी
शाकिरा बेगम बताती हैं कि जैसे ही सबसे बड़ा बेटा सलीम और बेटी तबस्सुम अपने पैरों पर खड़े हुए, उन्होंने छोटी बहनों की पढ़ाई की जिम्मेदारी उठा ली। पांच साल पहले पिता का काम भी बंद कर दिया। अब्दुल राशिद की दुकान अब उनका भांजा संभाल रहा है।
छोटे भाई से प्रेरणा ली अब्दुल राशिद ने
अब्दुल राशिद बताते हैं कि उनके पिता भी कैंची पर धार लगाने का काम करते थे। उनकी कमाई इतनी ही थी कि छह भाई-बहनों में कोई एक ही पढ़ सकता था। उन्होंने अपने छोटे भाई नूरे नजर को पढ़ने का मौका दिया। खुद दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी। नूरे नजर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने के बाद प्रोफेसर बन गए और अब सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं। बच्चों को पढ़ाने की प्रेरणा अब्दुल राशिद को छोटे भाई से ही मिली। वह उन पर गर्व करते हैं और उन्हें अपना आदर्श भी मानते हैं।
विज्ञापन
मूल रूप से एटा के रहने वाले अब्दुल राशिद 1980 में रोजगार की तलाश में बरेली आए थे और ठिरिया में रहने वाले अपने ससुराल वालों की मदद से यहीं बस गए। शहामतगंज में एक किराये की दुकान में चाकू-कैंची में धार रखने का पुश्तैनी धंधा शुरू कर दिया। राशिद बताते हैं कि जब उनके बेटे और बेटियों ने होश भी नहीं संभाला था, तभी उन्होंने और उनकी पत्नी शाकिरा बेगम ने ठान लिया था कि अपने उन्हें तालीम दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। छोटी सी आमदनी में जीवनयापन की तमाम मुश्किलों के बावजूद उन्होंने अपने संकल्प को टूटने नहीं दिया।
विज्ञापन
राशिद बताते हैं कि सबसे पहले उनका बेटा सलीम सुल्तान अपने पैरों पर खड़ा हुआ। चौबारी के नवोदय विद्यालय से पढ़ाई पूरी करने के बाद बीकॉम ऑनर्स अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से किया। इसके बाद सलीम बदायूं में 15 हजार की प्राइवेट नौकरी करने लगे तो की तो राशिद कुछ सहारा मिल गया। इसी बीच बड़ी बेटी तबस्सुम ने दिल्ली की डीम्ड यूनिवर्सिटी जामिया हमदर्द से बीयूएमएस की प्रवेश परीक्षा पास कर ली। राशिद के सपनों को जैसे पंख लग गए। पढ़ाई के दौरान ही तबस्सुम की शादी हो गई। वह अब डॉक्टर पति के साथ दिल्ली में अपना अस्पताल चला रही हैं। दूसरे नंबर की बेटी अंजुम के एएमयू से एलएलएम करने के बाद राशिद ने उसकी शादी बुलंदशहर के एक कारोबारी से कर दी। इस बीच तीसरे नंबर की बेटी आरिफा का बरेली के एक मेडिकल कॉलेज में एडमिशन हो गया। वह एमबीबीएस की तीसरे साल की पढ़ाई कर रही है। सबसे छोटी राबिया भी नोएडा की शारदा यूनिवर्सिटी में मेडिकल की दूसरे वर्ष की छात्रा है।
विज्ञापन
शादी के लिए जुटाए पैसे भी पढ़ाई में लगा दिए
अब्दुल राशिद और उनकी पत्नी शाकिरा बेगम ने बड़ी बेटी तबस्सुम की शादी के लिए कुछ रकम इकट्ठी की थी, लेकिन जब उन्होंने तबस्सुम की पढ़ाई में दिलचस्पी देखी तो उस रकम को उसकी पढ़ाई पर ही खर्च कर दिया। बेटे सलीम ने बदायूं में प्राइवेट नौकरी करते हुए सीए बनने की ख्वाहिश जताई। उसे दिल्ली भेजा जहां उसने तैयारी करने के बाद सीए की पहले ग्रुप की परीक्षा पास की। सलीम ने सीए की पढ़ाई के बाद एमबीए भी किया। पिता अब्दुल राशिद ने घर के कागजों पर एजूकेशन लोन लेकर सलीम को एमबीए में दाखिला दिलाया। एमबीए के फौरन बाद उन्हें दुबई के जेद्दा में उन्हें चार्टर्ड एकाउंटेंट की नौकरी मिल गई।
अब बड़े बच्चों ने उठाई छोटों की पढ़ाई की जिम्मेदारी
शाकिरा बेगम बताती हैं कि जैसे ही सबसे बड़ा बेटा सलीम और बेटी तबस्सुम अपने पैरों पर खड़े हुए, उन्होंने छोटी बहनों की पढ़ाई की जिम्मेदारी उठा ली। पांच साल पहले पिता का काम भी बंद कर दिया। अब्दुल राशिद की दुकान अब उनका भांजा संभाल रहा है।
छोटे भाई से प्रेरणा ली अब्दुल राशिद ने
अब्दुल राशिद बताते हैं कि उनके पिता भी कैंची पर धार लगाने का काम करते थे। उनकी कमाई इतनी ही थी कि छह भाई-बहनों में कोई एक ही पढ़ सकता था। उन्होंने अपने छोटे भाई नूरे नजर को पढ़ने का मौका दिया। खुद दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी। नूरे नजर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने के बाद प्रोफेसर बन गए और अब सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं। बच्चों को पढ़ाने की प्रेरणा अब्दुल राशिद को छोटे भाई से ही मिली। वह उन पर गर्व करते हैं और उन्हें अपना आदर्श भी मानते हैं।