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हाथी बढ़े अब शहर की ओर
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बरेली/शाही। वन विभाग के अफसरों का अच्छा-खासा जमावड़ा बरेली में इकट्ठा करने के बावजूद नेपाल से भटककर आए हाथी काबू में आने को तैयार नहीं है। तीन दिन से लगातार हांका लगाकर वापस नेपाल के जंगलों की ओर भेजने की कोशिशों के उलट हाथियों के शुक्रवार को जिला मुख्यालय की ओर रुख करने से वन विभाग के अफसरों की सांसें चढ़ने लगी हैं। वनविभाग की सूचना पर प्रशासन भी अलर्ट हो गया है। एक कंपनी आरआरएफ के साथ भारी तादाद में पुलिस फोर्स और प्रशासनिक अफसरों को भी हाथियों की निगरानी में लगा दिया गया है। इस बीच हांका लगाकर हाथियों को वापस भेजने के अभियान में मदद के लिए सीतापुर के वनकर्मियों को भी बुला लिया गया है।
पिछले आठ दिनों के दौरान एक वन रक्षक समेत चार लोगों को मार चुके हाथियों की दहशत लगातार बढ़ती जा रही है। कुछ दिनों से दोनों हाथी बरेली के ही इलाकों में जमे हुए हैं। बृहस्पतिवार को ये हाथी बहेड़ी के गांव तिगड़ी से शाही के गांव परचाई पहुंचे थे। दिन भर इस गांव में गन्ने के खेतों में टहलने-खाने के बाद रात को हाथियों ने अपना रुख जिला मुख्यालय की ओर कर दिया और दस किलोमीटर चलकर शाही के ही गांव खानपुर पहुंच गए। खानपुर गांव जिला मुख्यालय से बमुश्किल 28 किमी दूर है। हाथियों के जिला मुख्यालय की ओर बढ़ने से वन विभाग की चिंता और बढ़ गई है। डीएफओ भारत लाल ने भीड़ को हाथियों से दूर रखने के लिए पुलिस-प्रशासन का सहयोग मांगा जिसके बाद शुक्रवार एसएसपी ने वन विभाग की मदद के लिए एक कंपनी आरआरएफ भेजी है। इसके साथ तीन इंस्पेक्टर, दस एसआई, तीन हेड कांस्टेबल और 24 सिपाहियों की ड्यूटी भी लगा दी है।
इससे पहले सुबह हाथियों के खानपुर पहुंचने की सूचना पर झांसी के मुख्य वन संरक्षक पीपी सिंह और गोंडा के मुख्य वन संरक्षक सुजय बनर्जी अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंच गए। बाद में बरेली के मुख्य वन संरक्षक ललित वर्मा भी पहुंच गए। मुख्य वन संरक्षक पीपी सिंह ने बताया कि गुरुवार रात हाथियों ने उत्तराखंड की ओर बढ़ना शुरू किया था लेकिन इसके बाद वे फिर पीछे मुड़कर खानपुर पहुंच गए। उन्होंने बताया कि भीड़ को करीब देख यह हाथी भड़कते हैं लिहाजा पूरे दिन कोशिश रही कि लोग उनके करीब न पहुंचें। भीड़ के दूर रहने से हाथियों का व्यवहार भी सामान्य दिखा। उन्होंने बताया कि शुक्रवार रात हाथियों को एक बार फिर हांका लगाकर उत्तराखंड की ओर बढ़ाने की कोशिश की जाएगी।
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रात में 15-20 किमी का सफर कर रहे हैं हाथी
मुख्य वन संरक्षक पीपी सिंह ने बताया कि हाथी रात भर में जंगल के अंदर 30-40 किमी तक का सफर तय कर सकता है। लेकिन ये दोनों हाथी रात भर में औसतन 15 किमी तक चल रहे हैं। उन्होंने बताया कि ये हाथी ज्यादा दूर सीधे नहीं चल रहे हैं। बीच-बीच में रुकते हुए फसलों और पेड़ों खाते-पीते चलने की वजह से उनकी रफ्तार कुछ कम है।
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पिछले आठ दिनों के दौरान एक वन रक्षक समेत चार लोगों को मार चुके हाथियों की दहशत लगातार बढ़ती जा रही है। कुछ दिनों से दोनों हाथी बरेली के ही इलाकों में जमे हुए हैं। बृहस्पतिवार को ये हाथी बहेड़ी के गांव तिगड़ी से शाही के गांव परचाई पहुंचे थे। दिन भर इस गांव में गन्ने के खेतों में टहलने-खाने के बाद रात को हाथियों ने अपना रुख जिला मुख्यालय की ओर कर दिया और दस किलोमीटर चलकर शाही के ही गांव खानपुर पहुंच गए। खानपुर गांव जिला मुख्यालय से बमुश्किल 28 किमी दूर है। हाथियों के जिला मुख्यालय की ओर बढ़ने से वन विभाग की चिंता और बढ़ गई है। डीएफओ भारत लाल ने भीड़ को हाथियों से दूर रखने के लिए पुलिस-प्रशासन का सहयोग मांगा जिसके बाद शुक्रवार एसएसपी ने वन विभाग की मदद के लिए एक कंपनी आरआरएफ भेजी है। इसके साथ तीन इंस्पेक्टर, दस एसआई, तीन हेड कांस्टेबल और 24 सिपाहियों की ड्यूटी भी लगा दी है।
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इससे पहले सुबह हाथियों के खानपुर पहुंचने की सूचना पर झांसी के मुख्य वन संरक्षक पीपी सिंह और गोंडा के मुख्य वन संरक्षक सुजय बनर्जी अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंच गए। बाद में बरेली के मुख्य वन संरक्षक ललित वर्मा भी पहुंच गए। मुख्य वन संरक्षक पीपी सिंह ने बताया कि गुरुवार रात हाथियों ने उत्तराखंड की ओर बढ़ना शुरू किया था लेकिन इसके बाद वे फिर पीछे मुड़कर खानपुर पहुंच गए। उन्होंने बताया कि भीड़ को करीब देख यह हाथी भड़कते हैं लिहाजा पूरे दिन कोशिश रही कि लोग उनके करीब न पहुंचें। भीड़ के दूर रहने से हाथियों का व्यवहार भी सामान्य दिखा। उन्होंने बताया कि शुक्रवार रात हाथियों को एक बार फिर हांका लगाकर उत्तराखंड की ओर बढ़ाने की कोशिश की जाएगी।
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रात में 15-20 किमी का सफर कर रहे हैं हाथी
मुख्य वन संरक्षक पीपी सिंह ने बताया कि हाथी रात भर में जंगल के अंदर 30-40 किमी तक का सफर तय कर सकता है। लेकिन ये दोनों हाथी रात भर में औसतन 15 किमी तक चल रहे हैं। उन्होंने बताया कि ये हाथी ज्यादा दूर सीधे नहीं चल रहे हैं। बीच-बीच में रुकते हुए फसलों और पेड़ों खाते-पीते चलने की वजह से उनकी रफ्तार कुछ कम है।