धौरहरा से लड़ने की जिद, फिर भी जितिन को नहीं मिली जीत

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Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Fri, 24 May 2019 02:30 AM IST

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लखीमपुर खीरी। 2009 में धौरहरा की जनता के साथ भावानात्मक नाता जोड़ने वाले ‘प्रसाद परिवार’ के उत्तराधिकारी जितिन प्रसाद की लगातार दूसरी बार करारी हार ने पार्टी के रणनीतिकारों को हिलाकर रख दिया है। लखनऊ सीट से चुनाव लड़ाए जाने की कोशिशों के बीच धौरहरा से ही लड़ने की उनकी जिद यह जता रही थी कि वह जीत के लिए काफी आश्वस्त हैं, मगर धौरहरा की जनता ने जितिन प्रसाद को सिरे से नकार दिया। वहीं उनके मना करने के बाद लखनऊ में बिना किसी पूर्व तैयारी के मैदान में उतरने वाले प्रमोद कृष्णम जितिन से कहीं ज्यादा वोट पा गए। अब जितिन के खेमे के लोग यही कह रहे हैं कि उनसे किसी को कोई शिकायत नहीं है, लेकिन मोदी के चेहरे के कारण शायद जनता ने जितिन प्रसाद को स्वीकार नहीं किया।
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इंदिरा गांधी से लेकर पीवी नरसिम्हा राव के काल तक देश-प्रदेश की कांग्रेसी सियासत में जितिन प्रसाद के पिता जितेंद्र प्रसाद का नाता रहा। जितेंद्र प्रसाद ने कई बार संगठन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जितेंद्र प्रसाद के निधन के बाद बेटे जितिन प्रसाद ने सियासत की पारिवारिक विरासत को संभालते हुए राहुल गांधी के करीबी बन गए। वर्ष 2004 में जितिन प्रसाद कांग्रेस के टिकट पर शाहजहांपुर से सांसद बने और केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किए गए। उनके पास कई विभाग रहे, जिनमें वह राज्यमंत्री रहे।

परिसीमन के चलते शाहजहांपुर सीट सुरक्षित हो गई तो लखीमपुर खीरी में दो सीटें बनाते हुए धौरहरा सीट अस्तित्व में आ गई। जितिन प्रसाद ने शाहजहांपुर की सीमा से जुड़ी होने के कारण धौरहरा सीट को अपनी कर्मभूमि बना लिया। 2009 में धौरहरा की जनता ने उन पर विश्वास जताते हुए रिकार्ड मतों से विजयी बना दिया तो पार्टी ने उनका केंद्रीय राज्यमंत्री का ओहदा बरकरार रखा। फिर वर्ष 2014 में मोदी लहर में वह चौथे पायदान पर पहुंच गए, लेकिन न सिर्फ उन्होंने धैर्य बनाए रखा, बल्कि लगातार धौरहरा क्षेत्र में आकर जनता से मिलते रहे। उन्होंने गन्ना भुगतान, महंगाई और बिगड़ती कानून व्यवस्था के मुद्दे पर आंदोलन भी किए। चुनाव हारने के बाद भी वह धौरहरा संसदीय क्षेत्र में अपनी सियासी जमीन मजबूत करने में जुटे रहे। शायद, यही वजह रही कि 2019 के लोकसभा चुनाव की पहली सूची में ही पार्टी ने उनका टिकट घोषित कर दिया, लेकिन 22 मार्च को यह खबर फैल गई कि जितिन प्रसाद भाजपा में जा रहे हैं तो जिले में ही नहीं वरन शाहजहांपुर से लेकर लखनऊ तक में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई। हालांकि जितिन प्रसाद ने इस खबर को महज काल्पनिक बताया था। बाद में पार्टी द्वारा उन्हें लखनऊ से चुनाव लड़ाने की भी खबर वायरल हुई, फिर लखनऊ जाते समय धौरहरा की जनता ने उन्हें मैगलगंज में रोक लिया। खुद जितिन ने अपना भावात्मक नाता जोड़ते हुए उन्होंने लोगों को समझाया और उनकी भावनाएं पार्टी नेतृत्व को बताई। आखिर बाद में उन्होंने कहा कि वह धौरहरा की जनता से दूर जाने वाले नहीं हैं। उन्होंने लोगों की निष्ठा और प्रेम के बूते धौरहरा से ही चुनाव लड़ने की बात की और मैदान में उतरे। चुनाव जनसंपर्क के दौरान भी उन्होंने लोगों को भावनाओं में बांधा। दो तरफा प्यार से उन्हें लग रहा था कि इस बार जीत जाएंगे। वह यह भी मान रहे थे कि रेखा वर्मा से लोगों की नाराजगी भी उनकी राह आसान करेगी। लोग उन्हें जीत के लिए आश्वस्त भी करते रहे, लेकिन गुरुवार को जब परिणाम आए तो जनता ने उन्हें सिरे से नकार दिया।
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धौरहरा की जनता और कार्यकर्ताओं का ऋणी रहूंगा: जितिन
कांग्रेस नेता जितिन प्रसाद का कहना है कि धौरहरा क्षेत्र की जनता से उनका पारिवारिक नाता बन चुका है। सभी से वह अपना दिली लगाव महसूस करते हैं। लोकसभा चुनाव में जनादेश का सम्मान करता हूं। जिन लोगों ने उन्हें वोट दिया और जिन कार्यकर्ताओं ने चुनाव के दौरान परिश्रम कर उनके लिए काम किया, उनका सदेव ऋणी रहूंगा।

ये रहे हार के प्रमुख कारण
मुस्लिम वोटों को अपनी ओर नहीं खींच पाए।
ब्राह्मण वोटों में भी सेंध नहीं लगा पाए।
कांग्रेस का धौरहरा में कोई मजबूत संगठन न होना। शाहजहांपुर के कांग्रेसियों पर ही ज्यादा भरोसा रखा।
इस्पात राज्यमंत्री रहते हुए स्टील फैक्टरी का वर्ष 2008 में बेहजम में शिलान्यास कराया, मगर 2009 में धौरहरा से ही जीतने के बाद वह कोई नई ईंट नहीं रखवा पाए। यह बात इस चुनाव में भी मुद्दा बनी रही।

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