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संक्रमित कोख से निकली सेहतमंद ‘किलकारी’
अमर उजाला ब्यूरो/बहराइच
Updated Tue, 01 Dec 2015 09:59 PM IST
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बहराइच। जाने-अनजाने दोनों ही एचआईवी से संक्रमित हो गए। लेकिन, जब मां बनने का सौभाग्य नसीब हुआ तो नौ महीने तक अपनी कोख में पल अंश को एचआईवी से बचाने के लिए हर जतन किए।
आखिरकार कई घंटे प्रसव पीड़ा से तड़पने के बाद उसने शिशु को जन्म दिया। डिलीवरी के समय महिला अस्पताल के स्टाफ की सांसें अटकी रहीं लेकिन नए मेहमान की किलकारियां गूंजते ही सभी चहक उठे।
ये दास्तां उस दंपती की है, जो एचआईवी पॉजिटिव थे। मां की कोख में नन्ही जान पर मौत का खतरा मंडरा रहा था। लेकिन, आज उनकी सजगता से ये दंपती समाज में सम्मानजनक जीवन बिता रहे हैं।
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इसका खुलासा पीपीटीसी की जांच से हुआ है। डॉक्टरों के मुताबिक दो वर्ष में अब तक एचआईवी पीड़ित नौ महिलाओं ने एचआईवी निगेटिव बच्चे को जन्म दिया है।
डॉक्टरों का दावा है कि अगर चिकित्सकीय परामर्श लेकर संतान प्राप्ति की जाए, तो शिशु को एचआईवी से बचाया जा सकता है। केवल 30 फीसदी मामले ऐसे होते हैं, जिनमें शिशु में जन्म के कुछ सालों बाद रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने पर एचआईवी के लक्षण दिखते हैं।
उत्तर प्रदेश राज्य एड्स नियंत्रण सोसायटी व स्वास्थ्य विभाग के प्रयास से जिला महिला अस्पताल में प्रिवेंशन ऑफ पैरेंट्स टू चाइल्ड ट्रांसमिशन सेंटर (पीपीटीसी) स्थापित है।
गर्भवती होने के बाद जांच के लिए महिलाएं अस्पताल की दहलीज चढ़ती हैं। इस दौरान आम जांचों के साथ एचआईवी की जांच भी होती है। जांच के दौरान यदि एचआईवी की पुष्टि होती है, गर्भवती की काउंसलिंग व सुरक्षित प्रसव कराने के लिए काउंसलर द्वारा प्रेरित किया जाता है।
आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2015 में 241 गर्भवती महिलाओं की जांच पीपीटीसी में हुई है। इस दौरान तीन महिलाएं एचआईवी ग्रसित पाई गई हैं। वहीं वर्ष 2014 में सात गर्भवती महिलाएं एचआईवी पॉजिटिव मिली थीं।
काउंसलिंग के दौरान यह भी मालूम हुआ कि जो महिलाएं एचआईवी पॉजिटिव हुई हैं, उनके पति काम के सिलसिले में अन्य प्रांतों में नौकरी करते हैं।
जांच के दौरान पति व पत्नी, दोनों एचआईवी संक्रमित पाए गए। इनमें ड्रग्स यूजर्स के अलावा मजदूर व रिक्शा चालकों की संख्या अधिक है।
एचआईवी की चपेट में नहीं शिशु
महिला अस्पताल की मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. मधु गैरोला पिछले साल सात गर्भवती महिलाएं एचआईवी पॉजिटिव मिली थीं। छह मामलों में एचआईवी निगेटिव संतानें पैदा हुई हैं।
एक गर्भवती प्रसव के लिए अस्पताल नहीं आई है। उसका कुछ पता नहीं चल पा रहा है। जबकि इस साल अभी तक तीन डिलीवरी हो चुकी है। खास बात यह है कि जन्मा कोई भी शिशु अभी एड्स की चपेट में नहीं आया है।
कई जोड़े बिता रहे हैं सुखमय वैवाहिक जीवन
जिले के 100 गांवों में एड्स पीड़ितों के लिए काम कर रही शरणम् संस्थान के जिला प्रबंधक राजेश पाठक ने बताया कि पिछले साल एक एचआईवी पॉजिटिव युवती का विवाह एक संक्रमित युवक के साथ तय हुआ था लेकिन विवाह के कुछ दिन पूर्व ही युवती की मौत हो गई। उ
नका कहना है कि गांवों में कई ऐसे जोड़े हैं, जिन्हें संतान की प्राप्ति हुई है। शिशु एचआईवी निगेटिव हैं। काउंसलिंग में मालूम हुआ कि पति एचआईवी पॉजिटिव था। प्रसव के दौरान जब जांच हुई तो दंपती को मालूम हुआ।
उन्होंने कहा कि समाज में आज भी एचआईवी पॉजीटिव लोगों को स्वीकार्यता नहीं मिल पाई है। ऐसे में एक दूसरे का साथ ही एड्स पीड़ितों को विवाह के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
चूंकि अब बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं भी उपलब्ध हो गई हैं, लिहाजा वंश को आगे बढ़ाने की इच्छा भी पूरी होने लगी है।
पीपीटीसी सेंटर पर ऐसे होता इलाज
डॉ. मधु गैरोला कहती हैं कि प्रिवेंशन ऑफ पैरेंट्स टू चाइल्ड ट्रांसमिशन कार्यक्रम के तहत आधुनिक मल्टी ड्रग एंटी रेट्रो वायरल थेरेपी दी जाती है। इस थेरेपी में महिला को प्रतिदिन एक गोली का सेवन करना होता है।
चिकित्सकों द्वारा नौ माह तक एचआईवी संक्रमित महिला की सतत जांच की जाती है। प्रसव के दो घंटे में नवजात को नेविरापिन सीरप की एक खुराक और बच्चे को उसके वजन के हिसाब से 49 दिनों तक इस सीरप की खुराक देना जरूरी है।
छह सप्ताह होने पर बच्चे की एचआईवी जांच और इसके बाद बच्चे को सेप्ट्रान सीरप की एक खुराक 18 महीनों तक दी जाएगी। इस प्रकार गर्भस्थ शिशु को नौ माह तथा प्रसव पश्चात 18 माह की देखभाल से एचआईवी संक्रमण से बचाया जा सकता है।
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आखिरकार कई घंटे प्रसव पीड़ा से तड़पने के बाद उसने शिशु को जन्म दिया। डिलीवरी के समय महिला अस्पताल के स्टाफ की सांसें अटकी रहीं लेकिन नए मेहमान की किलकारियां गूंजते ही सभी चहक उठे।
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ये दास्तां उस दंपती की है, जो एचआईवी पॉजिटिव थे। मां की कोख में नन्ही जान पर मौत का खतरा मंडरा रहा था। लेकिन, आज उनकी सजगता से ये दंपती समाज में सम्मानजनक जीवन बिता रहे हैं।
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इसका खुलासा पीपीटीसी की जांच से हुआ है। डॉक्टरों के मुताबिक दो वर्ष में अब तक एचआईवी पीड़ित नौ महिलाओं ने एचआईवी निगेटिव बच्चे को जन्म दिया है।
डॉक्टरों का दावा है कि अगर चिकित्सकीय परामर्श लेकर संतान प्राप्ति की जाए, तो शिशु को एचआईवी से बचाया जा सकता है। केवल 30 फीसदी मामले ऐसे होते हैं, जिनमें शिशु में जन्म के कुछ सालों बाद रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने पर एचआईवी के लक्षण दिखते हैं।
उत्तर प्रदेश राज्य एड्स नियंत्रण सोसायटी व स्वास्थ्य विभाग के प्रयास से जिला महिला अस्पताल में प्रिवेंशन ऑफ पैरेंट्स टू चाइल्ड ट्रांसमिशन सेंटर (पीपीटीसी) स्थापित है।
गर्भवती होने के बाद जांच के लिए महिलाएं अस्पताल की दहलीज चढ़ती हैं। इस दौरान आम जांचों के साथ एचआईवी की जांच भी होती है। जांच के दौरान यदि एचआईवी की पुष्टि होती है, गर्भवती की काउंसलिंग व सुरक्षित प्रसव कराने के लिए काउंसलर द्वारा प्रेरित किया जाता है।
आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2015 में 241 गर्भवती महिलाओं की जांच पीपीटीसी में हुई है। इस दौरान तीन महिलाएं एचआईवी ग्रसित पाई गई हैं। वहीं वर्ष 2014 में सात गर्भवती महिलाएं एचआईवी पॉजिटिव मिली थीं।
काउंसलिंग के दौरान यह भी मालूम हुआ कि जो महिलाएं एचआईवी पॉजिटिव हुई हैं, उनके पति काम के सिलसिले में अन्य प्रांतों में नौकरी करते हैं।
जांच के दौरान पति व पत्नी, दोनों एचआईवी संक्रमित पाए गए। इनमें ड्रग्स यूजर्स के अलावा मजदूर व रिक्शा चालकों की संख्या अधिक है।
एचआईवी की चपेट में नहीं शिशु
महिला अस्पताल की मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. मधु गैरोला पिछले साल सात गर्भवती महिलाएं एचआईवी पॉजिटिव मिली थीं। छह मामलों में एचआईवी निगेटिव संतानें पैदा हुई हैं।
एक गर्भवती प्रसव के लिए अस्पताल नहीं आई है। उसका कुछ पता नहीं चल पा रहा है। जबकि इस साल अभी तक तीन डिलीवरी हो चुकी है। खास बात यह है कि जन्मा कोई भी शिशु अभी एड्स की चपेट में नहीं आया है।
कई जोड़े बिता रहे हैं सुखमय वैवाहिक जीवन
जिले के 100 गांवों में एड्स पीड़ितों के लिए काम कर रही शरणम् संस्थान के जिला प्रबंधक राजेश पाठक ने बताया कि पिछले साल एक एचआईवी पॉजिटिव युवती का विवाह एक संक्रमित युवक के साथ तय हुआ था लेकिन विवाह के कुछ दिन पूर्व ही युवती की मौत हो गई। उ
नका कहना है कि गांवों में कई ऐसे जोड़े हैं, जिन्हें संतान की प्राप्ति हुई है। शिशु एचआईवी निगेटिव हैं। काउंसलिंग में मालूम हुआ कि पति एचआईवी पॉजिटिव था। प्रसव के दौरान जब जांच हुई तो दंपती को मालूम हुआ।
उन्होंने कहा कि समाज में आज भी एचआईवी पॉजीटिव लोगों को स्वीकार्यता नहीं मिल पाई है। ऐसे में एक दूसरे का साथ ही एड्स पीड़ितों को विवाह के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
चूंकि अब बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं भी उपलब्ध हो गई हैं, लिहाजा वंश को आगे बढ़ाने की इच्छा भी पूरी होने लगी है।
पीपीटीसी सेंटर पर ऐसे होता इलाज
डॉ. मधु गैरोला कहती हैं कि प्रिवेंशन ऑफ पैरेंट्स टू चाइल्ड ट्रांसमिशन कार्यक्रम के तहत आधुनिक मल्टी ड्रग एंटी रेट्रो वायरल थेरेपी दी जाती है। इस थेरेपी में महिला को प्रतिदिन एक गोली का सेवन करना होता है।
चिकित्सकों द्वारा नौ माह तक एचआईवी संक्रमित महिला की सतत जांच की जाती है। प्रसव के दो घंटे में नवजात को नेविरापिन सीरप की एक खुराक और बच्चे को उसके वजन के हिसाब से 49 दिनों तक इस सीरप की खुराक देना जरूरी है।
छह सप्ताह होने पर बच्चे की एचआईवी जांच और इसके बाद बच्चे को सेप्ट्रान सीरप की एक खुराक 18 महीनों तक दी जाएगी। इस प्रकार गर्भस्थ शिशु को नौ माह तथा प्रसव पश्चात 18 माह की देखभाल से एचआईवी संक्रमण से बचाया जा सकता है।